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हुजूम (भीड़)

एक गाँव था हिन्दीस्तान वहाँ कई सालों तक एक ही सरपंच मूल चंद खान का एकाधिकार रहा। हर बार वही जीत कर सरपंच बनता। उसके विपक्ष में खड़ा फ़रहान चतुर्वेदी हर साल हार जाता। एक तरफ जहाँ मूल चंद खान के अंदर घमंड और अहंकार जन्म लेने लगा कि उसे कोई नही हरा सकता। वही दूसरी और फ़रहान चतुर्वेदी जीत के लिए ताबड़तोड़ कोशिश करने लगा।

हिन्दीस्तान गाँव के लोग बहुत सीधे साधे और विनम्र थे। गाँव मे रहने वाला प्रत्येक परिवार के बीच आपसी स्नेह बना हुआ था। वक़्त के साथ गाँव वालों को मौजूदा सरपंच अत्याचारी लगने लगा। यह सही भी था क्योकि उसके अधीन काम करने वाले कई पंच पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। वही दूसरी और फ़रहान चतुर्वेदी यह समझ गया कि अगर वो हिन्दीस्तान गाँव के रहने वाले लोगों को बाँट दे, तब उसकी जीत निश्चित है।

इसी इरादे के साथ उसने गाँव वालों को बाँटना शुरू कर दिया। कभी वो लोगो को उनके पहनावे के आधार पर बाँटता तो कभी उनके खान पान को कभी उनकी भाषा को तो कभी उनके रंग रूप को इस तरह से हिन्दीस्तान गाँव कई अलग अलग समूहों में बट गया। गाँव वाले बदलाव चाहते थे किसी भी कीमत पर वही फ़रहान चतुर्वेदी सरपंच का चुनाव जितना चाहता था किसी भी कीमत पर, यही हुआ भी।

अगले चुनाव में फ़रहान चतुर्वेदी भारी मतों से जीत हासिल करने में कामयाब रहा। सभी को यह लगा कि फ़रहान चतुर्वेदी सब कुछ ठीक कर देगा। वही फ़रहान चतुर्वेदी को यह पता था की जब तक गाँव के लोग बटे हुए है सिर्फ तभी तक उसकी कुर्सी पर हुकूमत है। इसीलिए उसने अपने हर फैसले ऐसे लिए जो उन्हें पहले से और ज्यादा बाँट देता। जब भी कोई गाँव वाला गाँव के विकास की बात करने लगता तो वह मुद्दे को भटकाने के लिए एक और फुट डालने वाला मुद्दा खड़ा कर देता।

देखते ही देखते पूरा गाँव कई टुकड़ो में बट गया। पहले लोग एक साथ रहते शादी बियाह त्यौहार हर तरह के छोटे बड़े काम मिलकर किया करते थे। लेकिन फ़रहान चतुर्वेदी ने पूरे गाँव के लोगो झूटी बात बोल कर झुटे तथ्य बता कर झुटे सबूत पेश कर ऐसा बाँट दिया था कि अब उन सबको वापस एक करना लगभग न मुमकिन ही था।

गाँव के ही एक पाखंडी पुरोहित ने सरपंच के झूठ से प्रभावित हो कर पीपल के पेड़ के नीचे बैठ कर यह घोषणा किया की श्याम प्रसाद खान एक बच्चा चोर है। वो बच्चा चुरा के उनकी बली देता है वो इस गाँव को बरबाद कर देना चाहता है। ये गाँव बुरी शक्तियों की चपेट में आ कर तबाह हो जाएगा। हम लोग या तो मर जायेंगे या फिर मार दिए जायेंगे।

इसीलिए मैं आपसे कहता हूँ कि इससे पहले श्याम प्रसाद खान हमे और हमारे बच्चों को मार दे। उससे पहले ही हम सब को मिलकर श्याम प्रसाद खान को पहले मार देना चाहिए। गाँव के लोग इकठ्ठा हुए और लाठी डंडा लेकर श्याम प्रसाद खान के घर के तरफ चल पड़े। गाँव वालों का हुजूम रास्ते में ही था कि उन्हें दूसरी तरफ से श्याम प्रसाद खान आता हुआ दिखा।

गाँव वालों के उस हुजूम ने पाखंडी पुरोहित के कहने पर सीधे श्याम प्रसाद खान पर हमला कर दिया। श्याम प्रसाद खान अपनी जान की उनसे भीख माँगता रहा। लेकिन किसी ने नही सुना और सभी गाँव वाले उसे बड़ी बेदर्दी से पीटते रहे। गाँव वालों का ये हुजूम उसे मारता रहा पिटता रहा। लेकिन वहाँ खड़े आस पास के लोगो में से एक भी आगे बढ़ कर उसकी मदद को नही आया।

श्याम प्रसाद खान वही ज़मीन पर पड़ा रहा और मर गया। गाँव का पूर्व सरपंच और पंच इस घटना का ज्यादा विरोध नही कर सके क्योकि वे सभी लोग उसके गाँव के थे जो अगले चुनाव में उसे वोट देने वाले थे शायद। इसी तरह से फ़रहान चतुर्वेदी ने पूरे गाँव को कई सालों तक बाँट रखा। लोगो का वो हुजूम दिन ब दिन बड़ा होता गया।

लेकिन कई साल तक ऐसा होते रहने से गाँव वालों की माली हालत बिगड़ती रही। अब वो भूखे थे और रोजी रोटी की माँग करने लगे यद्यपि वो अभी भी बटें हुए थे। लेकिन फिर भी उनकी जरूरत ने उन्हें अब फिर से एक करना शुरू कर दिया था। लोगों का वो हुजूम अब सिर्फ हुजूम नही था। बल्कि लोगो का वो हुजूम अब फिर से गाँव वाले होने लगे थे।

उन्हें यह बात अब समझ आने लगी थी कि किस तरह से फ़रहान चतुर्वेदी ने उन्हें लोगो से भीड़ में बदल दिया। किस तरह उसने हम सब को अलग अलग मसलों पर बाँट दिया। किस तरह से फ़रहान चतुर्वेदी ने असली मुद्दों से हमे भटका के हमे अपने लिए इस्तेमाल किया। उसने हमें लोगो से हुजूम में बदल दिया और हमारे ही हाँथो हमारा ही नुकसान करवाता रहा।

जैसे जैसे लोगो को समझ आती गयी फ़रहान चतुर्वेदी के सरपंच अलग अलग चुनाव में अलग अलग जगह से हारते गए। उनकी जगह अब नए और कुछ पुराने पंचों ने ले लिया। इसी तरह से कई साल लगे पूरे गाँव वाले के उस हुजूम को गाँव के लोगो में तब्दील होने में।

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