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कहानी – रूह अंतिम भाग



शाहीन की आखरी ख़्वाहिश के तौर पर नूर और अफज़ल का निक़ाह हुआ। वो वक़्त ही ऐसा था जहाँ पर नूर और अफज़ल को शाहीन की बात माननी ही पड़ी। लेकिन आँखे तो वो अब भी एक दूसरे से नही मिला पा रहे थे। शाहीन की तबियत अगले 24 घंटे के लिए क्रिटिकल बनी हुई थी।

तीन दिन बाद शाहीन हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हुई। अफज़ल हर रोज़ की तरह शाहीन के कमरे में ही ठहरता। उसी के कमरे में सोता ये कहना मुश्किल है कि वो ऐसा क्यों कर रहा था। इसलिए कि उसकी बीवी बीमार थी या फिर इसलिए कि वो अभी तक अपने अंदर मौजूद गिल्ट से बाहर नही निकल पाया था।

रोज़ की तरह अफज़ल आज शाम को जब घर लौटा तो शाहीन से सबसे पहले मिला। शाहीन ने आज ठान लिया था कि आज अफज़ल मेरे साथ नही बल्कि नूर के कमरे में सोएगा। जब अफज़ल खाना खाने के बाद शाहीन के कमरे में गया तो शाहीन ने उसे अपने कमरे में ठहरने से मना कर दी।

शाहीन के बहुत कहने के बाद अफज़ल नूर के कमरे में सोने को तैयार हुआ। पहले तो वो बाहर आँगन में ही चहलकदमी करता रहा। जब काफी रात हो गयी तो उसने सोचा कि नूर अब सो गई होगी। इसलिए वो नूर के कमरे में दाख़िल हुआ।

नूर अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी, अफज़ल चुप चाप सोफे पे लेट गया। अफज़ल अभी अपनी आँखें बंद करके लेटा ही था, की खामोशी टूटी।

अफज़ल आज मेरी गोद में अपना सर नही रखोगे। या फिर नूर को तुमने सही मायनों में भुला दिया। (नूर अपने बिस्तर पर बैठ गई)

अफज़ल ने अपनी आँखों पे रखे हाँथ को हटाया और करवट बदल के नूर की तरफ देखने लगा।

ऐसे क्या देख रहे हो ? (नूर)

यही की वक़्त का तुम पर कोई असर ही नही हुआ। बल्कि वक़्त के साथ तुम और भी निखर गयी। (अफज़ल)

मेरा मजाक बना रहे हो ? (नूर)

नही सच कह रहा हूँ। (अफज़ल)

सुनो मेरे पास आ कर लेट जाओ (नूर)

अफज़ल पहले झिझक रहा था लेकिन नूर के फिर से कहने पर वो सोफे से उठ कर नूर के साथ बिस्तर पर लेट गया। कुछ वक़्त के लिए दोनो खामोश रहे, किसी ने कुछ नही कहा। फिर दोनों ने अपनी चुप्पी तोड़ी –

अफज़ल एक बात पुछु ? (नूर)

हाँ पूछो। (अफज़ल)

क्या तुम मुझे याद करते थे। (नूर)

नही। (अफज़ल ने कहा)

याद उन्हें किया जाता है नूर जो भुला दिए गए हो, मैं तो तुम्हे कभी भुला ही नही। (अफज़ल)

मैं भी। (नूर ने बोली)

तुम मुझसे मिलने क्यों नही आये ? (नूर)

कैसे आता तुमने और अम्मी ने जो दीवार खड़ी कर दी थी। उस दीवार को तो मैं बड़ी आसानी से लाँघ जाता मगर उसकी वजह से दोनो में से किसी एक को खोना भी पड़ता। मुझ में इतनी हिम्मत नही थी नूर के मैं दोनो में से किसी भी एक को खो दूँ। इसलिए मैंने खुद को अल्लाह के भरोसे छोड़ दिया। (अफज़ल)

मुझे किसकी अमान (हिफाज़त, अमानत) में छोड़ आये थे तुम इतनी दूर अफज़ल ? (नूर)

जिस तरह मैंने ख़ुद को अल्लाह के भरोसे छोड़ दिया। ठीक वैसे ही मैंने तुम्हें अल्लाह की अमान में छोड़ आया। (अफज़ल)

दोनो रात भर बात करते रहे, ज़िन्दगी भर की शिक़वे शिकायतें सब कुछ एक दूसरे से शेयर करते रहे। सुबह हुई करीब 11 बज चुके थे लेकिन अफज़ल और नूर में से कोई भी कमरे से बाहर ही नही निकला। आखिर में शाहिस्ता अपने अब्बू अफज़ल और अम्मी नूर को उठाने के लिए गयी।

शाहिस्ता बाहर से दरवाजा खटखटा के आवाज़ देने लगी। लेकिन अंदर से कोई भी जवाब नही मिला। शाहिस्ता दरवाजा खटखटाते हुए अंदर चली गयी।

अब्बू आज आपको काम पे नही जाना क्या, सुबह के 11 बज रहे है। (शाहिस्ता)

कोई जवाब न मिलने पर शाहिस्ता आगे बढ़ी।

अब्बू मैं पर्दा हटा के अंदर आ रही हूँ। (यह कह कर शाहिस्ता धीरे धीरे अफज़ल और नूर की तरफ बढ़ने लगी। बीच बीच में वो आवाज़ भी देती गयी, लेकिन उसके किसी भी सवाल का उसे जवाब नही मिल रहा था।)

जब वो बिस्तर के करीब पहुँची तो देखी की अफज़ल और नूर की आँखे खुली हुई थी। वो दोनो सीधे एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे। जैसे कि आँखों ही आँखों में वे दोनो अपनी बात कह रहे हो।

लो जी यहाँ पूरी दुनिया के लिए सुबह हो गयी लेकिन अम्मी अब्बू है कि अभी तक बिस्तर पर पड़े है। (शाहिस्ता)

अपने किसी भी सवाल का जवाब न मिलने पर शाहिस्ता बिस्तर की तरफ बढ़ी और अपने अब्बू के हाँथ पर हाँथ रख के उन्हें उठने के लिए कहने लगी। लेकिन तभी उसने महसूस किया कि अब्बू का हाँथ बहुत ठंडा है। उसने फौरन तफ्तीश (छान बीन) की उसने अपनी अम्मी नूर को भी हिलाया लेकिन नूर भी चुप थी उसका शरीर भी ठंडा था।

शाहिस्ता चीख़ मार के रोने लगी, उसकी चीख और रोने की आवाज़ सुन कर बाकी लोग भी अफज़ल और नूर के कमरे की तरफ दौड़ पड़े। जब शाहिल गफ़्फ़ुर और शाहिल की बीवी वहाँ पहुँची तो सब हैरान थे। शाहिस्ता दीवान के पास जमीन पर बैठे हुए दीवान से टेक लगाए रोये जा रही थी।

शाहिस्ता की भाभी आगे बढ़ के शाहिस्ता को संभालने लगी। शाहिल और गफ़्फ़ुर भी रोने लगे उन सब की रोने की आवाज़ सुन कर। शाहीन का दिल घबराने लगा वो अपनी जगह से उठी और धीरे धीरे करके वो नूर और अफज़ल के कमरे में पहुँची। वहाँ का मंज़र देख कर शाहीन का दिल थम के रह गया।

शाहिल क्या हुआ है क्यो रो रहे हो तुम सब। शाहिस्ता ये चीखे क्यो मार मार के रो रही है। गफ़्फ़ुर (दामाद) आगे बढ़ा और उसने शाहीन (सास) को संभाल लिया। उसने धीरे धीरे शाहीन को बिस्तर की तरफ लाया। शाहीन बिस्तर पर ही बैठ गई।

अफज़ल अफज़ल, अफज़ल नूर नूर उठो नूर सुबह हो गई है। अफज़ल उठो नूर उठो, अब उठ भी जाइये जी, कब तक यूँही सोते रहेंगे। (शाहीन बदहवासी में बोले जा रही थी।)

उनके घर से रोने की आवाज़ सुन कर पड़ोसी भी घर में इकठ्ठा होने लगे। अफज़ल और नूर की मौत हो चुकी थी उनकी साँसे शायद रात के वक़्त या फिर तड़के सुबह ही थम चुकी थी। गफ़्फ़ुर आगे बढ़ा और दोनो की आँखों की पलके उसने गिरा दी।

देखने वालों ने देखा कहने वालों ने कहा कि अफज़ल और नूर की रूह उनकी आँखों में उतर कर मौत के फरिस्ते के हवाले हो गयी। अफज़ल और नूर की मोहब्बत का ये अंजाम देख कर सब रोने लगे। लेकिन कही न कही एक सुकून था कि मरने से पहले वो एक दूसरे के लिए हमेशा हमेशा के लिए हो के रह गए।

शाहीन का तो रो रो कर बुरा हाल था वो कहती “मौत मुझे आनी थी और तुम्हे लेकर चली गयी। अब मैं किसके सहारे ज़िन्दा रहूँगी अफज़ल हाय नूर तू भी छोड़ गई मुझे। (शाहीन रोते हुए)

पुरे घर में मातम का माहोल था कुछ दिन पहले जहाँ सब खुश थे. आज वही सब दुखी और बेजान थे आस पड़ोस के लोगो ने बहुत सहारा दिया शाहीन और उसके बच्चों को, वक़्त जैसे जैसे बीतता गया नूर और अफज़ल को दफ्न करने के लिए लोग कहने लगे! लेकिन जब उन्हें दफ़नाने की बात आई तो शाहीन बोली – अफज़ल की वसीयत थी कि उसे मरने के बाद उसे उसके अम्मी अब्बू के कब्र के बाजू में दफ़्न किया जाए।

लखनऊ के लोगो को जब अफज़ल और नूर की मौत की ख़बर मिली तो पूरा शहर उठ कर उनके जनाज़े में शामिल हुआ। अफज़ल और नूर का जनाज़ा मौलवी साहब के घर से निकला और बाज़ार से होते हुए। वही बाज़ार जहाँ कभी चाँद बीबी का कोठा हुआ करता था। वहाँ से होते हुए कब्रिस्तान पहुँचा।

लोगो की आँखों में आँसू थे, जिन्होंने ने अफज़ल और नूर की दास्तान सुनी नही बल्कि अपनी आँखों से देखी थी। उनकी आँखें नम थी अजनबी मुसाफ़िर लोग पूछते की ये किसका जनाज़ा जा रहा है। लोग कहते नूर ए अफज़ल (नूर का अफज़ल), नूर ए अफज़ल (नूर का अफज़ल) नूर ए अफज़ल (नूर का अफज़ल)।

वसीयत के मुताबिक अफज़ल और नूर को लखनऊ ला कर अफज़ल के अब्बू मौलवी फखरुद्दीन और उसकी अम्मी फ़रिहा बी के बाजू में दफ़्न किया गया। नूर बेगम को अफज़ल के बाजू में दफ़्न किया गया। कुछ अरसे बाद बीमारी और अफज़ल और नूर की मौत के ग़म में शाहीन की भी मौत हो गयी। शाहीन को नूर के बाजू में दफ़्न किया गया।

अफज़ल और शाहीन के दोनो बच्चे दिल्ली में ही रहने लगे। बीच बीच में कभी कभी अफज़ल या शाहिस्ता अपने वालिद और वालिदा दादा दादी नाना नानी के कब्र पर फूल चढ़ा कर फ़ातिहा पढ़ आते थे। कुछ साल बाद जब सड़क का डामरीकरण हुआ तो लोगो ने कलेक्टर से कह कर कोठे वाली गली का नाम नूर के नाम पर रखा और अफज़ल के घर की तरफ जाने वाली गली का नाम अफज़ल के नाम पर रखा गया।

शाही बाज़ार का नाम बदल के शाहीन बाज़ार कर दिया गया। यह नूर गली और अफज़ल गली के बीच में पड़ने वाला बाज़ार था। आखिरकार शाहीन की वजह से ही अफज़ल और नूर फिर से मिल पाए थे। इसी बाजार में नूर और अफज़ल आया करते थे। कभी अफज़ल नूर को देखने के लिए यहाँ घंटो इन्तेज़ार करता था। नूर कभी कभी खरीदारी के लिए इन्ही बाज़ारो में चेहरा छुपा के आया करती थी।

हुस्न ढल जाती है, जवानी बिखर जाती है

और यादें वक़्त के साथ धुँधली पड़ जाती है

नाम किस्से कहानियों दास्तानों में सिमटे रहते है

नाम बदनामी वक़्त के साथ भुला दिए जाते है

रिस्ते नाते दिल के ज़ज्बात सब बिखर जाते है

मिट्टी के शरीर मिट्टी में ख़ाक हो जाते है

वादे कसमे शिकायते कही पीछे रह जाते है

दास्तानों में इश्क़ करने वालो के नाम रह जाते है

सब कुछ मिट जाता है सब कुछ बिखर जाता है

रह जाती है तो बस पाक रूह और मोहब्बत

The End

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