Ad Code

ख़सारे (घाटे) में हूँ



दुनिया की नज़र में, हाँ मैं अभी ख़सारे में हूँ।

मैं जहाँ देख रहा हूँ, दुनिया कहा देख पाई है।

इश्क़ के हर मुक़ाम पे, सब कुछ तू हँस के लुटा।

ना पाने की ज़िद कर, ना खोने की तू फ़िक्र रख।

मेरी तो ज़िद है कि मैं फ़ना हो जाऊँ, तू मुझे

ता-उम्र ख़सारे में रख, बस मैं तेरा हो जाऊँ।

तेरी नज़र उठे तो मैं हाज़िर हो जाऊँ।

तू जिधर जिधर को चले मैं उधर हो जाऊँ।

ना मलाल मुझको है, की तू मुझे किस हाल रखता है।

बस इतना काफ़ी है तू मुझे अपने ख़्याल में रखता है।

अरे मेरा क्या था जो मैंने तुझ पर लुटा दिया।

सब कुछ तो तेरा था सो सब कुछ लौटा दिया।

क्या ये दर्द अपने है या खुशी रंजो ग़म अपने है।

अरे कुछ नही है अपना, फिर कैसे मैं ख़सारे में हूँ।

ये क़मर, आफ़ताब, अब्र, जमीं, ज़ैरो ज़बर सब कुछ

तू ही तू है, सब कुछ तेरा है,फिर कैसे मैं ख़सारे में हूँ।

दुनिया की नज़र में, हाँ मैं अभी ख़सारे में हूँ।

मैं जहाँ देख रहा हूँ, दुनिया कहा देख पाई है।

अगर चाह है देखने की तो फिर नज़र भी रख।

तू तिनके पे भी, ज़मीनों आसमां को रख।

ये ख़्याल न रख, के ये हो ही नही सकता।

तू ख़ुद को इन परदों के साये से दूर रख।

ये ना सोच के ज़माना तुझे देखता है, टोकता है।

अगर है इश्क़ तो फिर ज़माने को तू पैरों में रख।

इश्क़ करना भी चाहते हो या सिर्फ झूठे दावे ही करोगे।

अगर करना है इश्क़, तो ख़ुद को हमेशा ख़सारे में रख।

अरे बहुत नवाज़ दे तुम्हे, वो ही तो नवाज़ने वाला है।

मगर पहले तू ख़ुद को उसके इश्क़ में ख़सारे में रख।

दुनिया की नज़र में, हाँ मैं अभी ख़सारे में हूँ।

मैं जहाँ देख रहा हूँ, दुनिया कहा देख पाई है।

Reactions

Post a Comment

0 Comments