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सब कुछ नया है, सब कुछ नया सा है



ए हवा मेरा एक पैग़ाम लेती जा।

जा कर उसे अदब से सलाम कर।

फिर उससे कहना –

मुझे उनसे मोहब्बत तो है।

मगर अब उनकी आरज़ू नही।

भले तुम लौट आओ मेरे पास

तो हजार बार क़बूल है मुझे।

मगर अब ये हम से न होगा

के रातों को जागे।

और हर दुआ में उसे पाने की

रट लगाए

न होगा हम से के उसके बिना

ज़िंदगी जीना छोड़ दे

न होगा हम से

के रात दिन उनकी

ग़ौरो फिक्र में डूबे रहे।

ये और बात है।

जब भी दुआ में हाँथ उठे

उनकी खुशियाँ माँगी।

लेकिन अब ये हम से न होगा

के हम हँसना छोड़ दे।

अब हम पहले से भी ज्यादा

ज़िंदा दिली से जीते है।

कभी भूले बिसरे

तुम्हारी याद आती है

तो दोस्तों की तरफ

राह पकड़ते हैं।

अब तो लोग भी,

भूलने लगे इस बात को

के हम भी कभी टूट के बिखरे थे।

अब लोग मिलते है मुझ से

तो तरस नही खाते।

हैरानी से तकते है मुझे

सर से लेकर पाऊँ तक।

फिर कहते है,

कुछ तो नया सा है।

मैं कहता हूँ,

कुछ नही,

बल्कि सब कुछ नया सा है।

पूछने वाले पूछते है,

उसका (तुम्हारा) क्या हुआ।

उसकी याद नही आती

या मोहब्बत ही न थी तुम्हे।

अरे हमने तो,

मोहब्बत करने वालो को

तड़प कर मरते देखा है।

तुम बताओ,

तुम्हारी मोहब्बत कैसी थी?

तुम्हे देख कर लगता ही नही

के तुम तुम हो।

और मैं बस मुस्कुरा कर,

इतना कहता हूँ।

मुझ में सब कुछ नया है,

सब कुछ नया सा है।

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