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स्त्री



जब पुरुषों के समूह में,

कोई स्त्री आ कर बैठती है।

तब पुरुषों के अहंकार पे,

वो पहली चोट करती है।

फिर पुरुषों के द्वारा

वह रंडी कह दी जाती है।

पुरूष प्रधान समाज में,

जब वो हक़ की बात करती है।

तब वह पुरुषों के स्वामित्व पर,

प्रश्न चिन्ह लगाती है।

फिर पुरुषों के द्वारा,

रंडी घोषित कर दी जाती है।

टूटे फूटे लड़खड़ाते,

थरथराते शब्दों और स्वर से

जब वो शिक्षा की और

आगे बढ़ने की बात कहती है।

फिर पुरुषों के द्वारा,

रंडी घोषित कर दी जाती है।

वासना वशीभूत पुरुष,

सौ स्त्री से संभोग कर ले।

फिर भी देवताओं सा पूजनीय

उसे पूजा ही जाता है।

एक स्त्री प्रेम में सब कुछ, कह दे सौंप दे।

फिर भी वह रंडी कह दी जाती है।

घर हो बाहर हो स्कूल हो या कॉलेज हो।

दफ़्तर हो या बीहड़ हो, हर जगह स्त्री चाहिए।

मगर हम पुरुषों को स्त्री मालकिन नही चाहिए।

हम चाहते है वो अधिकारों से वंचित रहे।

हम चाहते है वो अंधकार की गर्त में दुबकी रहे।

हम चाहते है, वो जिम्मेदारियों के बोझ तले।

वो दबी कुचली चुप चाप खामोश रहे।

हम चाहते है, वो पलट के जवाब न दे।

बस सर झुकाए हमारी आज्ञा सुने।

पुरूष की आज्ञा पर चले और उसी पे मरे।

जब पुरुष चाहे

तो वो कपड़े उतार उसके बिस्तर गर्म करें।

अगर वो ऐसा करती है, सब कुछ सहती है।

तो वह सम्मानित स्त्री है, वरना वह रंडी है।

हाँ वो रंडी है,

क्योंकि वह पुरुषों को चुनौती देती है।

पुरुषों की दुनिया में,

स्त्री तभी तक सम्मानित है।

जब तक वो पुरुषों के,

जूतों के नीचे है।

जब जब वो जूतों के नीचे से,

अपना सर उठाएगी।

तब तब वह स्त्री,

रंडी घोषित कर दी जाएगी।

तुम स्त्री हो श्रृंगार करो,

पुरुषों की तरह न ललकार भरो।

तुम फूलों सी कोमल बनो,

न दहकती आग बनो।

तुम स्त्री हो,

पुरुषों के हृदय लुभाव

बात बात पे पुरुषों से न टकराव।

तुम स्त्री हो कमजोर बनो

बात बात पे युद्ध की न हुँकार भरो।

तुम स्त्री हो सहायता की भिक्षा माँगो।

अधिकारों और न्याय की न बात करो।

बाज आओ अपना सर झुकाओ,

या फिर तुम रंडी कहलाओ।

हे स्त्री तुम ही विचार करो

तुम्हे जीवन का संघर्ष चाहिए,

या फिर पुरुषों की शरण चाहिए।

तुम्हे योद्धा की अमरत्व वीरता चाहिए,

या सुखमय सोने का पिंजरा चाहिए।

तुम्हे जीवन साथी चाहिए,

या नया मालिक चाहिए।

हे स्त्री थोड़ा तुम इस पर विचार करो।

तुम सब कुछ पा सकती हो।

तुम दो ही मार्ग चुन सकती हो।

या तो पुरुषों की अधीनता स्वीकार करो।

या फिर तुम कुल्टा, कलंकिनी, कुलच्छनी रंडी

का अलंकार ग्रहण करो।

मगर हे स्त्री तुम चाहे जो भी चुनाव करो

बस मन से खुद को स्वीकार करो।

फिर चाहे तुम अधिकारों की युद्ध लड़ो।

फिर चाहे तुम, अपमान का घूँट पियो।

बस इतना एक उपकार करो

अपने मन का साथ धरो।

समझौता वही करो,

जिसे आत्मा स्वीकार करे।

तुम फलों फूलों आगे बढ़ो।

व्यापार करो अधिकार करो

बस इस पथ का ध्यान धरो,

तुम देह का न व्यापार करो।

विद्रोह करो शत्रु पे वार करो।

विनाश करो विकास करो।

सम्पूर्ण वसुंधरा पर तुम,

क्रांति की जय जय कार करो।

पुरषों के अपशब्दों पे तनिक न विचार करो।

रंडी कुल्टा कुलछिनी कलंकिनी

जैसे अपशब्दों को सर सम्मान स्वीकार करो।

क्योकि यह प्रमाण है,

के स्त्री जीवित है तुम में

उसका तो सम्मान करो।

पुरुषों की गालियाँ

समय की धारा में अस्तित्व खो देंगी।

अगर रह जायेगा कुछ शेष तुम में

तो वह स्त्री जिसे तुमने साकार किया।

तुम रंडी नही, स्त्री हो

मेरी ही तरह पुरुषार्थ हो

तुम कलंकिनी नही,

सम्मानीय विजय तिलक हो।

मेरी ही तरह खुद में विश्वास करो।

कभी पथ में तुम्हारे अगर मैं आ जाऊँ।

तुम्हारे मार्ग का रुकावट हो जाऊँ।

तनिक न विचारना, मुझे उसी क्षण

काली बन कर जड़ से उखाड़ना।

मैं पुरुष हूँ कई रूप बदलूँगा,

कभी पिता, कभी भाई, कभी प्रेमी,

तो कभी पति का रूप धर लूँगा।

तुम भी स्त्री हो, शक्ति का स्वरूप हो।

हो चाहे विरुद्ध कोई

तुम सबका उद्धार करो।

हे स्त्री तुम मुझ पर नही,

बस खुद पर विश्वास करो।

नोट: यह कविता उन महिलाओं को समर्पित जिन्होंने घर परिवार समाज से संघर्ष किया और अपनी एक अलग पहचान और अलग सोच बनाई. यह कविता उन महिलाओं को भी समर्पित है जो समाज के ताने और गालियों से बचने के लिए खुद से समझोता कर लिया है. आपको समझोता करने की जरुरत नहीं बस अपने मन की बात सुनने की जरुरत है, कोई भी समझोता तभी सही होता है जब आपका मन उसे दिल से स्वीकार करें.

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