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कहानी – रूह भाग 1



नूर को न देख पाने की वजह से अफज़ल बैचेन होने लगा। उसका दिल किसी और काम में नही लगता, वो बस नूर बानो को एक बार और जी भर के देखना चाहता है। एक रोज सुबह सुबह ही चाँद बीबी का मुलाज़िम मौलवी साहब के घर आया।

मौलवी साहब घर पे है? (मुलाज़िम ने पूछा)

जी नही अब्बा तो कुछ काम से बाहर गए हुए है। (अफज़ल ने कहा)

कब तक वो घर आ जायेंगे ? (मुलाज़िम)

जी कुछ कह नही सकता वो बता कर नही गए। (अफज़ल)

अच्छा चाँद बीबी ने कहा है कि आज मौलवी साहब घर आ कर फ़ातिहा पढ़ दें। क्या आप ये बात उनसे कह देंगे। (मुलाज़िम)

जी हाँ बिल्कुल। (अफज़ल)

चाँद बीबी का मुलाज़िम वहाँ से जाने लगा। तभी अफज़ल ने उसे रोक लिया।

सुनो मौलवी साहब कब तक आयेंगे ये तो पता नही। अगर तुम चाहो तो मैं चल सकता हूँ फ़ातिहा पढ़ने। (अफज़ल ने मुलाज़िम से कहा)

क्या आपका वहाँ जाना सही रहेगा, वो भी आपके अब्बा की इजाजत के बगैर? (मुलाज़िम ने सवाल किया)

उसकी चिंता मत कीजिये मैं अभी अम्मी से पूँछ लेता हूँ। (अफज़ल यह कह कर अंदर अपनी माँ से इजाजत लेने चला गया)

कुछ देर बाद वो बाहर आया तब मुलाज़िम ने उससे पूछा कि – इजाजत मिल गयी ?

जी हाँ मिल गयी, अब चले।

अफज़ल जब चाँद बीबी के कोठे की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था तो उसकी नज़र उसी खिड़की के आस पास घूमती जा रही थी। उसकी आँखें नूर बानो को खोजती रही लेकिन वो कही दिखी ही नही।

फ़ातिहा पढ़ने के बाद अफज़ल वहाँ से जाने लगा। तभी चाँद बीबी ने अफज़ल को रोक लिया। बेटा फ़ातिहा की खीर खा कर जाओ। चाँद बीबी और उनका मुलाज़िम उस रूम से चले गए।

कुछ देर बाद चाँद बीबी का मुलाज़िम खीर लेकर आया। तभी अफज़ल ने गौर किया कि कोई उसे पर्दे के पीछे से देख रहा है। वो उस पर्दे की तरफ बड़ी गौर से देखने लगा। इस उम्मीद में की वो नूर होगी।

वो वहाँ से उठ कर जाने लगा तभी पायल की छन-छन की आवाज़ उसके कानो में पड़ी। जैसे कोई दौड़ रहा हो वो आवाज़ धीरे धीरे धीमी होती गयी। अफज़ल चुप चाप उदासी लिए नीचे उतर आया।

मायूसी लिए वो अपने घर जाने लगा, तभी उसे एक परछाई दिखी जो चाँद बीबी के छत पे खड़े किसी व्यक्ति की थी। वो पीछे पलटा और छत की ओर देखने लगा। वो कोई और नही नूर बानो थी, नूर ने अफज़ल को देख कर नज़र अंदाज़ किया लेकिन अफज़ल था के बस उसे देखे ही जा रहा था।

अगले दिन नूर, अफज़ल को बाज़ार में मिली। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी उसने अफज़ल को नज़र अंदाज़ किया। यह सिलसिला चलता रहा, अफज़ल जब भी नूर बानो से मिलता। तो नूर बानो उसे नज़र अंदाज़ कर देती।

एक दिन अफज़ल के सब्र ने उसका साथ छोड़ दिया। अफज़ल ने नूर बानो से पूछ लिया – क्या मैं इतना बुरा हूँ कि मुझे नज़र अंदाज़ किया जाए। (यह बात उसने सब के सामने कही लेकिन नूर बानो की तरफ हो कर नही बल्कि सामने दुकानदार की तरफ हो कर)

नूर बानो समझ गयी कि यह उसने क्यो कहा। लेकिन उसने कोई जवाब न देते हुए वहाँ से चली गयी। बात आगे न बढ़ते देख अफज़ल ने नूर बानो को एक ख़त लिखा। उसने वो ख़त चाँद बीबी के मुलाज़िम को दिया, और कहा – ये ख़त नूर बानो को दे दीजिएगा।

अफज़ल ने उस ख़त में अपने जज़्बात लिखे। वो नूर बानो के लिए क्या महसूस करता है। उसके बारे में क्या सोचता है, कुछ मोहब्बत के दावे तो कुछ गीले शिक़वे। नूर बानो को वो ख़त मिला उसने पढ़ा भी लेकिन उसने उस ख़त के जवाब में कोई दूसरा ख़त नही लिखा।

अपने ख़त का जवाब न मिलने पर अफज़ल ने नूर बानो को फिर से खत लिखा। लेकिन उस खत का भी कोई जवाब नही आया। फिर तो यह सिलसिला ही बन गया, अफज़ल खत लिखता लेकिन उसे उन खतों का जवाब नही मिलता।

एक दिन फिर वो चाँद बीबी के कोठे पे गया। फ़ातिहा पढ़ने के बाद वो पर्दे की तरफ बढ़ा और उसने हाँथ पकड़ के उस शख़्स को पर्दे के बाहर खींच लिया। जो अक्सर उसे पर्दे के पीछे से देखा करता था। वो कोई और नही बल्कि नूर बानो ही थी।

खत लिखो तो खत का जवाब नही, बात कहो तो बातों का कोई जवाब नही। फिर भी आप मुझे हर बार इस पर्दे की आड़ में मुझे देखती है। क्यूँ देखती है आप मुझे क्या मैं जान सकता हूँ। (अफज़ल ने कड़े लहज़े में उससे पूछा)

अगर मोहब्बत करती हो मुझ से तो कहो कि हाँ करती हूँ। अगर नही करती तो भी कहो कि, की नही करती। कम से कम एक झटके में ही दिल तोड़ दो इस तरह चुप रह कर मुझे तड़पाओ मत। अब आप कुछ बोलेंगी या हमेशा की तरह चुप ही रहेंगी।

कहानी आगे जारी है………….

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