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कहानी – रूह भाग 2



अफज़ल की बाते सुन कर नूर बानो को एक तरफ डर लग रहा था तो दूसरी तरफ उसमे एक उत्साह भी था। नूर बानो ने अफज़ल के पूछे किसी सवाल का जवाब न देते हुए बस वहाँ से चुप चाप चली गयी।

अफज़ल एक बार फिर मायूस हुआ वो अपने घर लौट आया। अगली सुबह चाँद बीबी का मुलाज़िम मौलवी साहब के घर आया। अफज़ल थोड़ा घबरा गया कि कही नूर बानो ने शिक़ायत न कि हो। लेकिन जब मुलाज़िम ने अपनी बात कही तो अफज़ल की जान में जान आयी।

मौलवी साहब चाँद बीबी ने एक गुजारिश की है कि आप उनकी बेटी को क़ुरआन शरीफ पढ़ने की तालीम दे। मौलवी साहब मान गए उन्होंने मुलाज़िम से अपना जवाब भेजवा दिया।

अब हर रोज मौलवी साहब नूर बानो को पढ़ाने उसके घर जाते। जिसे दुनिया चाँद बीबी के कोठे के नाम से जानती और पहचानती है। मौलवी साहब अब घर पर भी अक्सर नूर बानो की तारीफ किया करते।

एक उस्ताद के तौर पर भी और एक बाप के तौर पर भी, मौलवी साहब की सिर्फ एक औलाद थी अफज़ल उनकी बेटी न होने की वजह से वो नूर बानो में अपनी बेटी को देखते थे। अफज़ल अक्सर अपने अब्बू के मुँह से नूर की तारीफ सुन कर खुश हो जाता।

इसी दौरान अफज़ल ने अपने अब्बू के सामने नूर बानो और अपनी बात कहने की कोशिश की लेकिन कह न सका। इसी दौरान अफज़ल की माँ अपने बेटे के लिए अपनी भाई की बेटी का रिस्ता अपने बेटे अफज़ल के लिए माँग ली।

भाई ने अपनी बहन को इनकार नही किया, ये जानते हुए की दौलत के मामले में उनकी बहन उनकी बराबरी नही कर सकती। लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी बेटी शाहीन का रिस्ता अफज़ल के लिए मंजूर कर लिया।

क्योकि अफज़ल के मामू भी इस बात को अच्छी तरह से जानते थे। शादी के इतने सालों बाद भी उनकी बहन ने कभी उनसे मदद नही माँगी। यहाँ तक कि उनके भाई ने मदद की पेशकश की भी तो उसे उनकी बहन ने मना कर दिया।

अफज़ल को जब ये बात मालूम हुई की उसकी माँ ने उसका रिस्ता शाहीन से तय कर रही है तो वो बहुत परेशान हो गया। वो सीधे मस्जिद चला गया अपने पिता के सामने पहुँचते ही उसका खून ठंडा पड़ने लगा। उसका सारा जोश बाप नाम की चट्टान से टकरा के ज़र्रा ज़र्रा हो रहा था।

वो अपने पिता को देखता तो कभी अपने हालात को सोचता। डर खौफ़ उत्साह शांति चाहत उल्फ़त मोहब्बत ये सब मिल कर उस वक़्त अफज़ल को आजमाने लगी। उसके हाँथों की उंगलियों के बीच पसीने की बूंदे सरकने लगी।

माथे पे पसीने की चमचमाहट के साथ आँखों मे बेताबी और डर खौफ़ का मंजर उसकी आँखों को लाल कर रहे थे। उसके सर से पसीने की एक बूंद सरकते हुए उसके कानों के पीछे से होते हुए उसके गले को चूमने लगी।

तभी एक हवा का हल्का झोंका आया और उसने उसके गर्दन को चूम लिया। जिसकी ठंडक से अफज़ल का शरीर एक पल के लिए सिहर उठा। उसके मुँह से यकायक निकला नूर…..। नूर का नाम अफज़ल के मुँह से सुनते ही मौलवी साहब ने अपने बेटे से पूछा।

तुमने नूर का नाम क्यो लिया ? (मौलवी साहब)

अब्बा वो मैं चाहता था कि आप (अफज़ल की ज़बान और उसकी आवाज़ उसका साथ नही दे रही थी।)

अब्बा मैं नूर बानो से निक़ाह करना चाहता हूँ। (अफज़ल ने डरते हुए अपनी बात अपने अब्बा से कहा। पहले तो मौलवी साहब शकते में आ गए फिर उसके बाद हँसने लगे। उन्हें लगा कि अफज़ल यह बात नादानी में कह रहा है।)

तुम जानते हो न बेटा की नूर बानो किसकी बेटी है। वो कहाँ रहती है उसके बाद भी तुम ये बात कह रहे हो। वैसे मजाक अच्छा था लेकिन बेटा किसी मज़लूम का मजाक कभी मत बनाया करो। अल्लाह को यह पसंद नही। (मौलवी साहब ने अफज़ल से कहा)

अब्बू मैं मजाक नही कर रहा ….. मैं सच मे नूर बानो से निक़ाह करना चाहता हूँ। (अफज़ल ने अपनी बात को इस बार पूरे दम के साथ उस पर ज़ोर देकर कहा)

ये जानते हुए भी की वो लड़की किस जगह से उसकी माँ कौन है। पागल वो लड़की तुमसे पूरे 4 साल बड़ी है। (मौलवी साहब)

अब्बा क्या तवायफ़ की बेटियों की शादी नही होती। या फिर अल्लाह ने उन्हें किसी से निक़ाह करने का हक़ ही नही दिया। (अफज़ल ने कहा)

बेशक अल्लाह ने सबको सबका हक़ दिया है लेकिन तुम समझ नही रहे। तुम यह बात अपनी नादानी में कह रहे हो अफज़ल। अभी तुम्हारी उम्र ऐसी है जहाँ सही और गलत का फर्क समझ नही आता। (मौलवी साहब)

तुम इस वक़्त सिर्फ जज़्बाती हो रहे हो। तुम्हारी कही हर बात जज़्बात में कही गयी है। इंसान के जज़्बात सही और गलत भी होते। उस पे जब कच्ची उम्र हो तो यह सोने पे सुहागा का काम करती है। बेहतर यही होगा कि तुम इस बात को भूल जाओ। (मौलवी साहब ने अफज़ल को समझते हुए)

मगर अफज़ल अपनी बात पे अड़ा हुआ था। लेकिन मौलवी साहब भी टस से मस नही हुए। अफज़ल उदास चेहरा लिए अपने घर लौट गया। मौलवी साहब ने जब अफज़ल की कही बात उसकी माँ को बताई तो अफज़ल की माँ आग बबूला हो गयी।

वो फौरन अफज़ल के कमरे में जा पहुँची वो बहुत गुस्से में थी। अफज़ल अफज़ल वो अपने बेटे का नाम पुकारती हुई उसके कमरे में दाखिल हो गयी। अफज़ल अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था।

उसकी माँ ने जब उसका हाँथ पकड़ के उसे उठाना चाहा तो वो डर गई। उन्होंने फौरन अफज़ल के माथे पे हाँथ रखा। अफज़ल का पूरा शरीर बुख़ार से तप रहा था। वो अपने शौहर को आवाज़ देने लगी – मौलवी साहब मौलवी साहब जल्दी इधर आईये।

आनन फानन में अफज़ल को अस्पताल में भर्ती कराया गया। वो बुख़ार से बुरी तरह तप रहा था, रात के अंधेरे में जब अस्पताल के ज्यादातर लोग सो रहे थे। तब अफज़ल अस्पताल से भाग कर सीधा नूर बानो के घर जा पहुँचा।

कहानी आगे जारी है………….

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