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कहानी – रूह भाग 4



नूर ने अफज़ल के सर को अपनी गोद से हटाई नही। वह उसके गालो पे हाँथ रख के उसे होश में लाने के हल्की थपकी के साथ कहती। (अफज़ल होश में आओ)

इसी दौरान नूर की नज़र उस ख़त पे पड़ी जिसपे अफज़ल लिख रहा था। नूर ने उस ख़त को उठाया और देख कर हैरान रह गयी। उस ख़त में हर जगह बस एक ही लफ्ज़ था “नूर”। हालाकि वो ख़त सिर्फ आधा ही लिखा गया था।

लेकिन उस ख़त में सिर्फ एक ही नाम हर जगह था “नूर”। यह देख कर नूर ने अफज़ल को जगाया नही उसे सोने दिया। रात भर नूर अफज़ल के सर को गोद में लिए बैठी रही। कभी उसके बालों में हाँथ फिराती तो कभी उसके हाँथो को चूम लेती।

कभी चाँद को देखती तो कभी अफज़ल को कभी हँसती तो कभी उदास होती। पूरी रात नूर ने अफज़ल के सिरहाने जाग कर काट दी। जब सुबह की रोशनी परदों से छन कर बैठक में पड़ने लगी। तो नूर ने अपने बालों को खोल कर उसे अफज़ल के चेहरे पर साया कर दिया।

* वो मंज़र बड़ा ही कमाल का था, उस मंज़र को न तो लफ़्ज़ों में बयाँ किया जा सकता है और न ही उसे दोहराया जा सकता है। *

जैसे चाँद ने झुक कर ज़मीन को चूमने की ख़्वाहिश की हो। और रात की काली जुल्फों ने उन पर पर्दा कर दिया हो। एक आवाज़ से अफज़ल की नींद खुली नूर उस पर अपने बालों से साया किये हुए उस पर झुकी हुई थी। अफज़ल की नज़र सीधे नूर की आँखों से टकराई और बस ठहर गयी।

कुछ वक़्त बाद मुलाज़िम आया, उसने नूर से कहा-

बीबी जी नीचे मौलवी साहब और उनकी बेगम खड़ी है। वो अफज़ल को अपने साथ ले जाने आयी है। (मुलाज़िम ने कहा)

उनसे कहिये की वो थोड़ी देर इन्तेज़ार करे अफज़ल खुद उनके पास आ जायेगा। (नूर)

मैं तुम्हारे बगैर कही नही जाऊँगा नूर (अफज़ल)

जानती हूँ लेकिन मैं अभी तुम्हारे साथ नही जा सकती। अगर तुम्हें मुझे अपने साथ ले जाना है, तो पहले तुम्हे इस क़ाबिल बनना होगा। (नूर)

तुम जो चाहोगी वो होगा नूर बस तुम बताओ तुम्हे क्या चाहिए। (अफज़ल)

(नूर मुस्कुराई) मुझे कुछ नही चाहिए, लेकिन मेरी ख़्वाहिश है कि तुम पढ़ लिख कर अफसर बनो। फिर उसके बाद तुम अपनी अफसर वाली गाड़ी में बिठा कर मुझे यहाँ से ले जाना। मैं तुम्हारे साथ चलूँगी, तुम जहाँ ले जाओगे वहाँ मैं तुम्हारे साथ साथ चलूँगी। लेकिन फिलहाल के लिए तुम्हे इस वक़्त अपने अम्मी अब्बू के साथ घर जाना चाहिए।

ये कह कर नूर ने अफज़ल को वहाँ से जाने के लिए कहा। अफज़ल इस बात को मान गया उसने नूर से वादा किया कि “अब अफज़ल नूर का दीदार तभी करेगा जब वो नूर के कहे मुताबिक नही हो जाता।”

अफज़ल वहाँ से चला गया, उसके बाद वो कभी नूर से नही मिला और न ही मिलने की कोशिश की, वो जब भी बाज़ार जाता तो उसका बहुत दिल करता कि वो नूर को देख ले। मगर उसने अपने वादे को टूटने नही दिया, अलबत्ता अब नूर अफज़ल को देखने को तरसती थी।

लेकिन उसने कभी भी अफज़ल को न तो बुलावा भेजा और न ही उसे कभी रास्ते मे रोकी। यूँही साल गुजर गए अब अफज़ल बड़ी मुश्किल से ही कभी दिखता था। दो साल बाद अफज़ल लखनऊ छोड़ के बाहर चला गया। नूर को जब इस बात की ख़बर हुई तो वो दुखी हो गयी।

नूर को लगा कि अफज़ल के वादे झुटे निकले वो कभी उसे अपनाएगा नही। एक तरफ जहाँ नूर दुखी थी तो दूसरी तरफ वो ख़ुश भी थी। मौलवी साहब का बेटा अब सिर्फ उन्ही की दिखाई राह पे चलेगा। वैसे भी मौलवी साहब उसके उस्ताद भी थे। नूर ने ख़ुद को यह कह कर समझाने की कोशिश की, कि ये मेरी तरफ से अपने उस्ताद को नज़राना था।

लेकिन वो कहते है ना सच्चे आशिक़ चाहे पूरी दुनिया घूम ले। लेकिन वो लौट कर आयेंगे अपने मेहबूब के दर पर ही। ऐसा ही कुछ हुआ नूर के साथ, सूरज आसमान से उतर चुका था और चाँद रोशन हो रहा था। रास्ते पे हलचल थी और नूर अपने कमरे में बैठी हुई बाहर की और देख रही थी।

वो हर आने जाने वाले शख़्स को देखती और उनका अपनी आँखों से मुआयना करती। बीच बीच में खेलते हुए बच्चों को देख कर मुस्कुरा देती। तभी अचानक से किसी ने नूर की गोद में अपना सर रख दिया। नूर ने जब नीचे देखा तो हैरान रह गयी। उसकी आँखों की पुतलियाँ फैल गयी उसके चेहरे सुर्ख़ लाल हो गए। वो उस वक़्त जाहिर ही नही कर पाई की वो खुशी जाहिर करे या फिर ग़म।

ये कोई और नही अफज़ल था जो तीन साल से भी ज्यादा वक़्त के बाद उसके पास वापस लौट आया था। दोनो एक दूसरे की आँखों में देखते रहे न नूर ने कुछ कहा और न ही अफज़ल ने। कई घंटे बीत गए दोनो में से किसी ने कुछ कहा ही नही। तभी दरवाज़े पे दस्तक़ हुई।

बीबी जी बाहर एक सफेद कार खड़ी है और कुछ पुलिस वाले कही कुछ गड़बड़ तो नही। (मुलाज़िम ने दरवाज़े के बाहर से ही पूछा)

नूर ने अफज़ल की तरफ देखा। अफज़ल ने आँखो से इत्मीनान रहने को कहा।

बाबा कोई गड़बड़ नही है वो अफज़ल की कार और उसके गार्ड है। (नूर ने कहा)

अपने वादे के मुताबिक नूर मैंने अपना वादा निभा दिया है। अब तुम्हे अपना वादा निभाना है तुम्हे मेरे साथ चलना होगा। तुम मेरी हो के रहोगी सिर्फ मेरी जैसा कि तुम ने कहा था। मैं तो उसी दिन तुम्हारी हो के रह गई थी, जिस दिन तुमने अपने खून से ख़त पे सिर्फ और सिर्फ मेरा ही नाम लिखा था।

तो फिर चलो नूर हम दोनों आज ही निक़ाह कर लेते। अफज़ल नूर का हाँथ अपने हाँथों में लेकर उसे उठने के लिए कहा। लेकिन नूर अपनी जगह से टस से मस नही हुई।

रुको मेरे प्यारे अफज़ल मैं तुम्हारे साथ नही जा सकती। तुमने अपना वादा पूरा किया है और मैं भी अपना वादा पूरी कर चुकी हूँ। अब तुम्हे यहाँ से चले जाना चाहिए और हाँ फिर दुबारा मत लौटना। (नूर ने अफज़ल से कहा, जब वह ये सब कह रही थी तो उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसका कलेजा कट के उसके मुँह को आता हो।)

नही नूर तुमने अपना वादा अभी पूरा नही किया। तुम भूल रही हो शायद तुम्हे मेरे साथ चलना है। (अफज़ल)

मैं तुम्हारे साथ ही तो हूँ उस रात से लेकर आज तक और आज से लेकर मौत तक मैं तुम्हारे साथ तुम्हारी यादों में तुम्हारे साथ साथ रहूँगी। मैं तो तुम्हारी हो चुकी हूँ नूर अब किसी और कि ज़िन्दगी का हिस्सा कभी नही बनेगी। मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ और तुम्हारे साथ भी मेरा वादा भी पूरा हुआ अफज़ल। (नूर ने अफज़ल की आँखों में देख कर कहा)

नही नूर तुम्हे अभी मुझसे निक़ाह करना है मेरे साथ घर बसाना है एक परिवार बनाना है। तब जा कर तुम्हारा वादा पूरा होगा नूर। (अफज़ल की आँख में आँसू थे)

नही मैंने अपना वादा पूरा किया है। मैंने कभी ये नही कहा था अफज़ल की नूर तुमसे निक़ाह करेगी तुम्हारे साथ घर बसायेगी परिवार बनाएगी। मैंने सिर्फ ये कहा था – की “मेरी ख़्वाहिश है कि तुम पढ़ लिख कर अफसर बनो। फिर उसके बाद तुम अपनी अफसर वाली गाड़ी में बिठा कर मुझे यहाँ से ले जाना। मैं तुम्हारे साथ चलूँगी, तुम जहाँ ले जाओगे वहाँ मैं तुम्हारे साथ साथ चलूँगी।

अब तुम ही बताओ अफज़ल क्या मैंने अपने वादे में कही भी ये कहा था कि मैं तुमसे निक़ाह करूँगी तुम्हारे साथ घर बसाऊंगी परिवार बनाऊँगी नही अफज़ल मैंने इसमे से एक भी बात अपने वादे में कभी नही कही। (नूर ने अपनी बात पे ज़ोर दे कर कहा)

अब यहाँ से जाओ अफज़ल अपने घर जाओ अपने माँ बाप की दुआ लो उनकी हर ख़्वाहिश को पूरा करो। अपनी माँ की पसंद की लड़की से शादी करो घर बसाओ परिवार बनाओ। नूर हमेशा तुम्हारे लिए दुआ करेगी, अब जाओ अफज़ल और दुबारा फिर कभी यहाँ मत आना।

कहानी आगे जारी है ……………

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