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कहानी – रूह भाग 5



नूर के बार बार कहने पर भी अफज़ल नूर से दूर नही जाना चाह रहा था। इसीलिए नूर ने जबरदस्ती उसे अपने घर से बाहर निकलवा दी। नूर यह करना तो नही चाहती थी मगर उसने ये मजबूर हो के किया। इश्क़ भी इंसान से क्या क्या करवाता है। ये तो वही अच्छे से जानते है जिन्हें इश्क़ है।

ख़ाक हो जाते है यहाँ, “इश्क़” करने वाले।

उनकी रूह है के एक “आह” भी करती नही।

नूर के अपने घर से निकाल देने के बावजूद अफज़ल अपने घर नही गया। वो वही रास्ते पे खड़ा रहा इस उम्मीद में की नूर उसे वापस बुला लेगी और उसके साथ चलेगी। लेकिन नूर का इरादा पक्का था उसने खिड़की और दरवाज़े बंद कर दिए और चुप चाप अपने बिस्तर पर लेट गयी।

कैसे नींद आयी होगी तुझे

मेरा क़मर (चाँद) मुझे जगा के खुद सोता रहा

नूर ने घर के दरवाज़े खिड़कियाँ और अपनी आँखें तो बंद कर ली। मगर उसके दिल का क्या जो ख़ून के आँसू रोता रहा। सुबह हुई रात भर नूर को नींद नही आई रात भर अफज़ल बाहर इन्तेज़ार करता रहा।

नूर को लगा कि अब अफज़ल चला गया होगा। ये सोच कर उसने खिड़की के दरवाज़े खोल दिये। नूर को देखते ही अफज़ल खड़ा हो गया। नूर ने अफज़ल को देखा और अफज़ल ने नूर को, अफज़ल को लगा कि शायद नूर अब मान जाए।

लेकिन नूर के तो दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। नूर सीधे नीचे आयी बाहर का दरवाज़ा खोली और अफज़ल के पास जाते ही उसे इतना बुरा भला कहने लगी जिसकी कोई हद्द न थी। देखते ही देखते लोगों का हुजूम लग गया। नूर ने मौलवी फखरुद्दीन साहब के बेटे की इज्जत भरे बाज़ार ऐसे उछाली की आने जाने वाले मुसाफ़िर भी ठहर ठहर के देखने लगे।

तभी एक ज़ोर दार तमाचा नूर को पड़ा वो गिरते गिरते बची। जब उसने पलट के देखा तो कोई और नही बल्कि अफज़ल की माँ और मौलवी फखरुद्दीन की बीवी फरिहा बी थी। अफज़ल ने अपनी माँ को रोका माँ के इस तरह बीच में आ जाने के कारण अफज़ल ने अपनी माँ को वहाँ से घर ले आया।

अफज़ल की माँ बहुत गुस्से में थी, उसने अफज़ल को जो सुनाया सो सुनाया ही। साथ ही साथ उसने मौलवी साहब को भी भर भर के खरी खोटी सुना दी। शायद फरिहा बी के ज़िन्दगी में ये पहली और आखिरी बार था जब उन्होंने मौलवी साहब को इस तरह खरी खोटी सुना दी।

आज से पहले फरिहा बी का मौलवी साहब को खरी खोटी सुनाना तो दूर कभी उनसे उचे आवाज़ में बात तक नही की। अफज़ल उस वक़्त चुप चाप रहा और थोड़ी देर बाद वो अपने कमरे में चला गया। अफज़ल ने सोचा जब अम्मी का गुस्सा शान्त होगा तब वो अपनी अम्मी से नूर और अपनी शादी की बात करेगा।

लेकिन शाम होते ही अफज़ल के घर पर अफज़ल के मामू और उनकी बेटी और कुछ खानदान के रिस्तेदार अफज़ल के घर आ पहुँचे। अफज़ल को लगा कि वे लोग उसे मुबारकबाद देने आए। क्योकि वह अफसर हो गया है, लेकिन उसके उम्मीद तब टूटी जब उसकी माँ ने कहा कि आज तुम्हारा निक़ाह है शाहीन के साथ।

अफज़ल के लाख मना करने के बावजूद उसकी माँ नही मानी। लेकिन अफज़ल भी अपनी ज़िद पर अड़ा हुआ था।

अम्मी अगर मैं निक़ाह करूँगा तो सिर्फ नूर के साथ वरना किसी से नही। (अफज़ल ने अपनी बात पर ज़ोर दे कहा)

अफज़ल मुझे उस काम के लिए मजबूर मत करो जो मैं करना नही चाहती। (अफज़ल की माँ फरिहा बी)

अम्मी आप भी तो मुझे मजबूर कर रही है। ये जानते हुए की मैं नूर से मोहब्बत करता हूँ, उसके बावजूद आप मुझे शाहीन के गले बांधना चाहती है। इस तरह से तो अम्मी न शाहीन खुश रह पाएगी और न ही मैं। (अफज़ल)

शाहीन में किस बात की कमी है, शाहीन नूर से कही ज्यादा ऊपर है। खानदान में भी क़िरदार में भी हर लिहाज़ से शाहीन नूर पर भारी है। शाहीन आसमान है तो नूर पैरों की धूल और पैरों की धूल को माथे पे नही सजाया जाता और न ही उसे घर की इज्जत बनाई जाती है। (अफज़ल की माँ फरिहा बी)

तो फिर समझ लीजिए अम्मी की आपके बेटे ने सड़क की धूल को अपने माथे पे सजाने का फैसला कर लिया है। (अफज़ल)

अफज़ल तुमने आख़िर मुझे मजबूर किया है उस काम के लिए जो मैं करना नही चाहती थी। तो फिर ठीक है अगर ये निक़ाह ऐसे नही तो फिर वैसे ही सही लेकिन ये निक़ाह होगा जरूर। अफज़ल मैं तुमसे अपने दूध का कर्ज़ चुकाने के लिए कहती हूँ। (अफज़ल की माँ)

मैं अपने दूध के कर्ज़ की माफी के बदले तुम्हे ये हुक्म देती हूँ कि तुम शाहीन से निक़ाह करोगे। उसे वो सारे हक़ दोगे जो एक बीवी का अपने सोहर पर होता है। उसे तुम वो सारी खुशियाँ दोगे जिसकी वो हक़दार है। तुम्हे अभी इसी वक्त आज ही शाहीन से निक़ाह करना होगा। अगर तुम ऐसा नही करते तो मैं अपना दूध का कर्ज़ माफ नही करूँगी। (अफज़ल की माँ ने अफज़ल से दो टूक कहा)

खानदान के सभी लोग के साथ साथ मौलवी साहब भी दंग रह गए। मौलवी साहब ने अफज़ल की माँ को खूब समझाना चाहा। लेकिन वो अपनी बात पे अड़ी रही, मौलवी साहब बार बार कहते रहे।

एक माँ हो के तुम भला अपनी औलाद से अपने दूध के कर्ज़ का सौदा कैसे कर सकती हो। (मौलवी साहब ने समझाते हुए कहा)

आज आपके सामने सिर्फ एक माँ नही है मौलवी साहब इस वक़्त में बहु भी हूँ और किसी की बेटी भी, जिसकी जिमेदारी ये आ पड़ी है कि उसे हर हाल में अपने खानदान की इज्जत बचानी है। जिस इज्जत को खुद उसी की औलाद एक कोठे वाली के कदमो तले रौंदवाने की ज़िद ठान ली है। (अफज़ल की माँ फरिहा बी ने कहा)

अभी ये नादान है अभी इसे समझ नही है इसे थोडा वक़्त दो। ये खुद समझ जाएगा कि क्या सही है और क्या गलत। (मौलवी साहब)

ये कोई दूध पीता बच्चा नहीं है जब बाप के जूते बच्चों के पैरों में आने लगे तभी उन्हें उनकी जिम्मेदारी का एहसास हो जाना चाहिए। वरना पूरी ज़िंदगी सिर्फ अफसोस में कटती है मौलवी साहब। (अफज़ल की माँ)

लोग समझाते रहे लेकिन अफज़ल की माँ मानने को तैयार ही न हुई। अब अफज़ल के सामने एक मुसीबत थी। अगर वो अपनी माँ की बात मान लेता है तो वो ख़ुद को कभी माफ नही करेगा। अगर वो अपनी माँ की बात अब टालता है तो उसका ख़ुदा उसे माफ नही करेगा।

अफज़ल ने अपनी माँ की बात मान ली। उसने ख़ुद को गिरा कर ख़ुदा के बनाये कानून और अपनी माँ को बुलंद कर दिया। और सारी ज़िन्दगी भर की शर्मिंदगी अपने नाम कर लिया। अफज़ल और शाहीन का निक़ाह हुआ, निक़ाह अफज़ल के अब्बू ने पढ़ाया।

सब ख़ुश थे या फिर ख़ुश होने का दिखावा कर रहे थे। तभी दरवाज़े पे दस्तक़ हुई मौलवी साहब नूर आयी है। इससे पहले की अफज़ल की माँ आगे बढ़ के नूर को ख़री खोटी सुनाती मौलवी साहब ने रोक दिया और उनसे चुप रहने को कहा।

अफज़ल उठ कर अंदर जाने लगा शायद वह नूर से अब नज़रे भी नही मिलाना चाहता था मिलाता भी कैसे? नूर अंदर आयी आँगन में ही सब लोग बैठे हुए थे। अफज़ल जा ही रहा था कि शाहीन ने उसका हाँथ पकड़ के उसे बैठने को कहा।

कहो बेटी आज यहाँ कैसे आना हुआ। (मौलवी साहब)

आप भी क़माल करते है मौलवी साहब एक तवायफ़ की बेटी को इतनी इज्जत न दीजिये। (नूर)

हम बाज़ारू लोग है हमे इज्जत रास नही आती। (नूर)

नूर का ख़ुद को बाज़ारू कहते ही अफज़ल के तन बदन में आग सी लग गयी। वो फौरन उठ खड़ा हुआ उसने अपने अब्बू से कहा।

अब्बू इसे यहाँ से फौरन जाने के लिए कहिये। किसी गैर का यहाँ कोई काम नही। (अफज़ल ने नज़र नीची रख के अपने अब्बू से कहा)

एक शिष्य अपने उस्ताद की ख़ुशी में शामिल होने आई है। इतना तो हक़ बनता है मेरा क्यूँ मौलवी साहब ठीक कहा न मैंने। (नूर)

बिल्कुल बेटी आओ तुम यहाँ बैठो। (मौलवी साहब)

नही मुझे थोड़ी जल्दी है मैं तो बस दुल्हन को तोहफ़ा दे कर जाने आई हूँ। (नूर)

नूर दुल्हन की तरफ बढ़ी उसके सामने जा कर ज़मीन पे घुटने के बल बैठ गई। उसने दुल्हन को गौर से देखा और फिर बोली।

आज नूर बानो को किसी से सबसे ज्यादा जलन हो रही है तो वो है तुम्हारी क़िस्मत से, खैर छोड़ो ये बात मैं तुम्हें कुछ देना चाहती थी। (नूर शाहीन को देखते हुए)

नूर ने अपने हाँथ की उँगली से एक अँगूठी उतारी और उसे दुल्हन के उँगकी में पहना दी। फिर उसने कहा-

तुम जहाँ भी रहो जिस हाल में भी रहो खुश रहो आबाद रहो। अगर ज़िन्दगी में कभी भी तुम्हे नूर बानो की मदद की जरूरत पड़े। तो बस इस अँगूठी को मुझ तक पहुँचा देना मैं फौरन हाजिर हो जाऊँगी। मैं कोई फ़रिश्ता तो नही की तुम्हे हर मुसीबत से बचा लूँ। लेकिन मुझसे जो बन पड़ेगा मैं वो तुम्हारे लिए करूँगी। (नूर)

कहानी आगे जारी है ……………

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