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कहानी – रूह भाग 6



नूर वहाँ से चली गयी अफज़ल अपने रूम में चला गया। बाकी मेहमान भी धीरे धीरे चले गए घर का माहौल शांत था। सब चुप थे जैसे किसी लंबी ख़ामोशी ने घर वालो पे कब्जा कर लिया हो।

अफज़ल अपनी माँ को दिए वादे के मुताबिक ज़िन्दगी गुजारने लगा। वह शाहीन को अपनी बीवी का दर्जा दे चुका था। दिन हफ्तों में हफ्ते महीनों में और महीने साल में गुजरते गए। कुछ साल बाद मौलवी साहब का इन्तेकाल हो गया। नूर उनकी मौत पर अफज़ल के घर गयी, मगर अफज़ल और नूर दोनो एक दूसरे से आँख चुराते रहे।

फिर ज़िन्दगी पहले की तरह चलती रही ख़ामोशी से दबे पाओं आगे बढ़ती रही। मौलवी साहब के इन्तेकाल के कुछ अरसे बाद अफज़ल की माँ का इन्तेकाल हो गया। नूर उनकी भी मौत पर अफज़ल के घर गयी शाहीन को दिलासा दी और वापस लौट गई।

अब घर में सिर्फ अफज़ल शाहीन और उनकी 3 साल की छोटी बेटी थी। जिसका नाम अफज़ल ने नूर रखा था, लेकिन अफज़ल की बेटी को अफज़ल को छोड़ बाकी सब लोग शाहिस्ता के नाम से पुकारते थे। ये नाम मौलवी साहब ने दिया था जो शाहीन के नाम से जा कर मिलता था।

कुछ अरसे बाद अफज़ल का ट्रांसफर हो गया और वो पूरे परिवार के साथ लखनऊ छोड़ के दिल्ली चला गया। अब लखनऊ में सिर्फ नूर रह गयी जो अब बहुत कम ही दिखा करती थी। कई साल बाद अफज़ल लखनऊ वापस आया। अपने माँ बाप की कब्र पर फूल चढ़ा के उनके लिए दुआ करता रहा।

जब वो पलट के जाने लगा तो उसने देखा नूर को, जो एक कब्र के पास चुप बैठी हुई थी। अफज़ल सोच ही रहा था कि वो नूर से जा कर बात करे। तभी चाँद बीबी का मुलाज़िम अफज़ल को देख कर उसके पास आया। अफज़ल ने नूर के बारे में पूछा –

नूर यहाँ क्या कर रही है चाचा (अफज़ल)

और कहाँ जाएगी बेचारी अब तो बस अकेले रह गयी है। (मुलाज़िम)

अकेले क्यों नूर की अम्मी है ना (अफज़ल)

तुम्हारे लखनऊ से जाने के कुछ अरसे बाद ही नूर की माँ का इन्तेकाल हो गया था। माँ के इन्तेकाल के बाद नूर ने कोठा बंद कर दिया। कोठे को बेच कर जो रुपये मिले उसे बाकी लड़कियों में बाँट उन्हें नई ज़िन्दगी शुरू करने के लिए जाने के लिए कह दिया। (मुलाज़िम)

अब तो मैं भी बहुत कम बीबी (बीबी) से मिल पाता हूँ। यही पास में किराए के घर में रहती है बच्चों को क़ुरआन पढ़ाती है। उसी से अपना गुजर बसर करती है, एक अरसा हो गया अफज़ल तुम्हारे निक़ाह के बाद मैंने कभी बीबी (नूर) जी को हँसते नही देखा। (मुलाज़िम)

अफज़ल अगर हो सके तो नूर की मदद करो। कुछ ऐसा जिससे नूर ख़ुश हो सके ज़िन्दगी को फिर से जी सके। ये लड़की साँस तो लेती है पर उस साँस में ज़िन्दगी की गर्मी नही है। किसी सुखी टूटी डाल की तरह नदी में बस बहे जा रही है। (मुलाज़िम)

मुलाज़िम वहाँ से चला गया, उसके जाने के बाद अफज़ल नूर की तरफ बढ़ा। वो नूर के ठीक पीछे खड़ा था, वो अपना हाँथ बढ़ा ही रहा था, की उसे अपनी माँ को दी गयी कसम याद आ गयी। वो पीछे हटा और वापस चुप चाप नूर को वही छोड़ कर वापस दिल्ली चला गया।

एक कसक तो रहेगी दोनों के दिलों में।

फिर चाहे हम दोनों कुछ कहे या ना कहे।

authoransari

वक़्त गुजरता गया और अफज़ल के बच्चे बेटी शाहिस्ता और शाहिल दोनो की शादी भी हो गयी। अब तो अफज़ल और शाहीन दादा दादी के साथ साथ नाना नानी भी बन चुके थे। उस कब्रिस्तान में अफज़ल ने नूर को आखरी बार देखा था। फिर उसके बाद वो कभी लखनऊ आया ही नही।

अफज़ल शाहीन और नूर वक़्त के साथ बूढ़े हो गए। मगर शाहीन को मालूम था कि उसका सोहर भले ही अपनी पूरी ज़िंदगी उसके नाम कर दिया हो। लेकिन उसकी रूह तो कभी उसके साथ थी ही नही। वो तो वही लखनऊ में ही नूर के पास रह गयी।

अफज़ल ने जो वादे किए उसने उन सभी वादों को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया। उसने कभी शाहीन को धोखा नही दिया। मगर शाहीन अब मौत के कगार पर थी। उसे टीबी हो गया था। वो मर रही थी, कहते है जब इंसान मरने लगता है। तो वह एक आखरी कोशिश करता है अपने चाहने वालो की खुशियाँ उन्हें देने की।

ताकि उसके जाने के बाद लोग उसे कोसे नही बल्कि उसे दुआओं में हमेशा याद रखे। शाहीन भी इसी हालात से गुजर रही थी। रह रह कर उसे नूर बानो की याद आती। उसे याद आती वो रात जिस रात शाहीन और अफज़ल का निक़ाह हुआ था। याद आती उसे अफज़ल की बेबसी याद आती उसे नूर का वो चेहरा। जिसपे उसने झूटी मुस्कान लिए उसे मुबारकबाद दी गयी।

बिना कुछ कहे ये कह गयी कि जाओ शाहीन मैंने अपना अफज़ल तुम्हे दे दिया। शाहीन यही सब सोच सोच कर खूब रोती, अफज़ल के पूछने पर भी वो उसे नही बताती। एक दिन शाहीन ने अपने बेटे शाहिल को अपने पास बुलाई, उससे बोली-

मेरे बच्चे मुझे नही पता कि मेरे पास और कितनी ज़िन्दगी बची है। मगर मरने से पहले मैं अपने गुनाहों को माफ करवाना चाहती हूँ। उन सभी लोगो से माफी माँगना चाहती हूँ। जिनका दिल तुम्हारी माँ की वजह से दुखा है। मेरे बेटे मेरा एक काम करोगे ?? (शाहीन ने अपने बेटे से कहा)

अम्मी आपका का हर हुक्म मैं मानूँगा बस आप ठीक हो जाये बस। (शाहिल)

नही मेरे बच्चे अब मैं ठीक नही हो सकती अब मेरा वक़्त आ चुका है। बस मेरा ये आखरी काम कर दो ताकि फिर मैं सुकून से मर सकूँ। (शाहीन)

नही अम्मी ऐसा मत कहिये। (शाहिल)

शाहिल मेरे बच्चे ये अंगूठी लो और लखनऊ जाओ। अपने वालिद और दादा दादी के घर। वहाँ जाने के बाद वहाँ के लोगो से नूर बानो के बारे में पूछना। अगर वो मिले तो उसे अपने साथ यहाँ ले आना। अगर वो न आये तो फिर उसे ये अँगूठी देना। कहना कि एक आखरी बार अपना वादा निभा दीजिये। (शाहीन खाँसने लगी)

और एक बात का ख़्याल रहे मेरे बेटे तुम कहाँ जा रहे हो इस बारे में तुम्हारे अब्बू को कोई ख़बर न होने पाए। (शाहीन)

अम्मी ये नूर बानो कौन है आपकी दोस्त है या फिर कोई पुरानी रिस्तेदार। (शाहिल)

नूर, वो है बेटा जिसने अपनी ज़िंदगी की पूरी खुशी पूरा सरमाया मुझ गरीब को खुशी खुशी दे दी। उसके बावजूद उसके लब पे एक आह भी नही और न ही कोई बद्दुआ। जाते जाते भी वो ये आखरी मदद मुझे दे गई, उस वक़्त तो मुझे लगा कि ये मेरे किसी काम का नही। लेकिन आज मुझे पता चला कि ज़िन्दगी में कुछ भी बेकार नही होता। हर एक चीज का एक मकसद होता है उसे पूरा किये बगैर वो अपना वजूद खो नही सकता। (शाहीन)

अफज़ल का बेटा शाहिल अकेले ही दिल्ली से लखनऊ के लिए निकल गया। वो लखनऊ पहुँचा उसी बाजार में गया और वहाँ के लोगो से नूर बानो के बारे में पूछने लगा। पूछते पूछते वो लखनऊ से दूर एक दिहाती इलाके में पहुँच गया। गाँव वालों से पूछने पर उन्होंने उसे नूर का पता दिया।

वो जब उस जगह पहुँचा तो वहाँ कोई घर नही था। बस एक पेड़ और उसके आस पास चबूतरा बना हुआ था। एक आदमी सड़क से गुजर ही रहा था कि शाहिल ने उसे रोक कर नूर बानो के बारे में पूछा। उसने कहा आप सही जगह पर आए है लेकिन माजी इस वक़्त नमाज़ पढ़ रही होंगी।

वो आदमी शाहिल को लेकर एक घर के करीब गया। उसने देखा एक बूढ़ी औरत घर के अंदर नमाज़ अदा कर रही है। घर तो सिर्फ नाम का था असल में वो एक टूटी फूटी कुटिया थी। जो कभी भी गिर कर ज़मीन दोज़ हो जाती।

लीजये यही है नूर बानो, लेकिन भला आप को इनसे क्या काम ?? (मुसाफ़िर)

एक कर्ज़ा है इनका मेरी अम्मी पर मेरी अम्मी की तबियत बहुत ख़राब है इसीलिए वो चाहती है कि सभी का कर्ज़ा जाने से पहले उतार दें। (शाहिल)

नमाज़ अदा करने के बाद शाहिल उस बूढ़ी औरत (नूर बानो) की तरफ बढ़ा।

अस्सलाम वालेगुम। (शाहिल ने सलाम किया)

वालेकुम अस्सलाम बेटा (नूर)

क्या आप ही नूर बानो है। (शाहिल)

हाँ बेटा, मगर तुम ये बात क्यो पूछ रहे हो। क्या मैं तुम्हे जानती हूँ माफ करना बेटा अब बूढ़ी हो गयी हूँ तो ज्यादा याद नही रहता। (नूर)

जी आप मुझे नही लेकिन शायद आप मेरी अम्मी को जानती है। (शाहिल)

तुम्हारी अम्मी का नाम क्या है बेटा ?? (नूर)

मेरी अम्मी का नाम शाहीन मिर्ज़ा और अब्बू का नाम अफज़ल मिर्ज़ा है। आप जानती होंगी उन्हें मेरे अम्मी और अब्बू दोनो लखनऊ से है। (शाहिल)

मेरी अम्मी की तबियत बहुत ख़राब है वो आखरी बार आप से मिलना चाहती है। क्या आप मेरे साथ चलेगी ?? (शाहिल)

शायद में कभी तुम्हारी अम्मी को जानती होंगी बेटा। लेकिन अब मैं इस नाम से किसी को नही जानती। मुझे माफ़ करना मैं तुम्हारी कोई मदद नही कर सकती। अल्लाह से दुआ है कि तुम्हारी अम्मी जल्द से जल्द ठीक हो जाये। (ये कह कर नूर जाने लगी)

रुकिए मेरे पास आपके लिए कुछ है। (शाहिल ने अपनी जेब से वो अँगूठी निकाल कर नूर बानो को दिया) मेरी अम्मी ने कहा था कि आप इसे देख कर समझ जायेंगी और मेरे साथ जरूर चलेंगी। (शाहिल)

ए मेरे अल्लाह तू क्या अब भी मेरा इम्तिहान लेता रहेगा। क्या तू अपनी इस गुनाहगार बंदी को माफ नही कर सकता। (यह कह कर नूर रोने लगी)

माजी आप रोइये मत, अगर आप नही जाना चाहती तो कोई बात नही। मैं अम्मी से कह दूँगा की आप मुझे मिली ही नही। वो अँगूठी मुझे वापस दे दीजिए। (शाहिल)

नही बेटा, मुझे तुम्हारे साथ जाना ही होगा। अगर तुम ये अँगूठी मुझे नही दिखाते तो मैं कभी तुम्हारे साथ नही जाती। लेकिन इस अँगूठी को देखने के बाद मुझे मेरा वादा याद है। नूर अपना वादा पूरा करेगी चलो बेटा कहाँ जाना है। (नूर ये कह कर उसकी तरफ बढ़ी)

अम्मा जी आपका सामान (शाहिल)

इस बुढ़िया के पास भला कौन सा सरमाया है बेटा। बस कुछ फटे पुराने कपड़े है। (नूर)

शाहिल नूर बानो को लेकर दिल्ली के लिए रवाना हो गया। सफ़र के दौरान आस पास के लोग शाहिल और उस बूढ़ी औरत को देखते। कहाँ एक खूबसूरत अच्छे लिबास पहना ये नौजवान और कहा ये भिखारन। शाहिल को उनकी ये नज़र चुभ रही थी, लेकिन फिर भी वह चुप रहा।

कहानी आगे जारी है ……………..

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