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कहानी – रूह भाग 7



शाहिल नूर बानो को लेकर अपने घर आ गया। जैसे ही शाहीन ने नूर बानो को देखा वो फुट फुट के रोने लगी। नूर की आँखे भी अश्क़बार हो गयी थी, जैसे दो बहनें बचपन में बिछड़ कर फिर मिल रही हो।

अफज़ल शहर से बाहर था उसे अभी तक पता नही था कि उसके घर में नूर बानो आई है। वो दूसरे दिन सुबह के वक़्त घर आया हमेशा की तरह वो घर आते ही सबसे पहले अपनी बीवी के पास गया। जैसे ही वो कमरे में दाखिल हुआ।

उसके कदम लड़खड़ा गए, उसने दरवाज़े को थाम लिया। कुछ वक्त के लिए उसने अपने होशो हवास खो दिए। उसे यकीन ही नही हो रहा था कि नूर उसके घर में है। बूढ़ी हो चुकी नूर को उसकी बूढ़ी आँखों ने ऐसे पहचान लिया। जैसे कि अभी कल ही कि बात हो। शाहीन ने अफज़ल को आवाज़ देकर उसे अपने पास बुलाई। फिर कहने लगी –

आप ने अपनी पूरी ज़िंदगी मेरे नाम कर दी मुझे इज्जत दी मुझसे वफ़ा भी की लेकिन मैं आपको इसके बदले कुछ न दे सकी। (शाहीन)

तुमने मुझे वो सब कुछ दिया है जो एक शौहर को मिलना चाहिए। हमारे दो नेक बच्चे है तुम हो मैं हूँ और मुझे क्या चाहिए। तुम बस जल्दी से ठीक हो जाओ। (अफज़ल)

नही, मैं बहुत बुरी हूँ। (शाहीन)

किसने कहा कि तुम बहुत बुरी हो तुमसे अच्छी बीवी कोई और हो ही नही सकती। अब आराम करो मैं कपड़े बदल के आता हूँ। (अफज़ल)

रुकिए! मेरे पास बैठिए, मैं अपने गुनाह का एतराफ़ करना चाहती हूँ। एक ऐसा गुनाह जो मेरे न चाहने के बावजूद मैंने किया। एक ऐसा सच जो आपको मुझे बहुत पहले ही बता देना चाहिए था। मगर मैं मजबूर थी मुझे अम्मी ने कसम दी थी कि ये राज़ हमेशा राज़ ही रहे।

मगर आज मैं अपने दिल से हर बोझ उतार देना चाहती हूँ। ताकि मैं सुकून से मर सकूँ, अफज़ल तुम्हे याद है। तुम नूर से शादी करना चाहते थे इस बारे में आपने अपने अम्मी अब्बू को बताया था। लेकिन वो नही माने, आपकी तबियत खराब हुई और फिर जब आप नूर के पास गए तो आपके अम्मी अब्बू नूर के पास गए।

लेकिन नूर ने उन्हें इन्तेज़ार करने को कहा इसी बीच आपके अम्मी और अब्बू नूर की अम्मी चाँद बीबी से मिले।

बस बहुत हुआ अब आगे एक और लफ्ज़ तुम्हे कहने की जरूरत नही शाहीन। तुम सच में बहुत भोली हो शाहीन, जो भी हुआ अच्छा हुआ। इसमे तुम्हारी कोई गलती नही वो सिर्फ वक़्त का तकाज़ा था। उसी में ख़ुदा की रज़ामंदी थी और ख़ुदा के आगे हम सब बेबस है।

ख़ुदा हमें आजमाता है शाहीन फिर जब हम कामयाब हो जाते है तो फिर वही है जो हमे बेहतरीन से बेहतरीन नवाज़ता भी है। ख़ुदा पे यकीन रखो और भूल जाओ की बीते हुए कल में क्या हुआ था। (नूर ने शाहीन को समझाते हुए कहा)

नही नूर हम इंसान अपनी गलतियों को ख़ुदा की रज़ा समझ के टाल देते है। लेकिन सच तो यही की हम अपने कर्मो की वजह से बनते है और बिगड़ते है। (शाहीन)

सुनिए उस दिन नूर ने आपको अपने घर से निकालना नही चाहती थी। वो मजबूर थी कुछ अपनी माँ की वजह से कुछ मौलवी साहब और आपकी अम्मी की एहसानों की वजह से कुछ अपने हालात की वजह से। आपकी अम्मी ने चाँद बीबी से वादा लिया था कि।

इससे पहले की शाहीन अपनी बात पूरी करती उससे पहले ही नूर ने उसे रोक दिया।

शाहीन तुम्हे मेरी कसम तुम्हे ख़ुदा की कसम शाहीन तुम अब आगे कुछ नही कहोगी। (नूर बानो ने कहा)

तुम यही कहना चाहती हो न शाहीन की अम्मी ने नूर की अम्मी से वादा लिया था कि नूर मुझे छोड़ देगी। वो मुझे कभी आस पास भी भटकने नही देगी। वो मुझे हमेशा हमेशा के लिए भुला देगी। यही सब तुम कहना चाहती हो न शाहीन। (अफज़ल ने शाहीन का हाँथ अपने हाँथ में लेकर कहा)

आपको सब पता था फिर भी आप चुप रहे। आपने कभी मुझे कोई तंज़ नही किया। (शाहीन)

शाहीन अम्मी ने अपने आखरी दिनों में मुझे सब कुछ बता चुकी थी। वो इस बात को पहले ही क़बूल कर चुकी थी, उन्होंने नूर और मेरे साथ जो भी किया वो हमारी नज़रों में शायद गलत हो सकता है। लेकिन एक माँ के नजदीक उसके औलाद की बेहतरी से ज्यादा और कुछ नहीं होता। माँ बाप हमेशा अपने बच्चों का भला चाहते है।

मुझे सब मालूम होने के बाद भी तुम्हे इस लिए कभी कुछ नही कहा क्योकि इसमे तुम्हारी कोई गलती थी ही नही। मेरे कंधो पे दो लोगो के वादे को पूरा करने की जिम्मेदारी थी शाहीन। अगर मैं सच जान कर नूर की तरफ पलटता तो अम्मी को दिए वादे से पलट जाता।

और अगर न पलटता तो अपने वादे से मैंने अम्मी के वादे को पूरी ईमानदारी से निभाया है। फिर चाहे इसमे मेरी मर्जी शामिल रही हो या फिर नही लेकिन मैंने अपना वादा पूरा किया है। बस दुख इस बात का है कि मैं अपना किया वादा कभी निभा ही नही सका। गुनाहगार तो हूँ मैं शाहीन लेकिन सिर्फ एक का और तुम बेहतर जानती हो किसका। (अफज़ल)

मैं चाहती हूँ कि मेरे मरने से पहले आप दोनों निक़ाह कर ले। ताकि आपकी बाकी की ज़िंदगी खुशी से गुजरे। (शाहीन)

शाहीन ये कभी नही हो सकता, तुम्हे आराम करना चाहिए। (ये कह कर अफज़ल कमरे से बाहर चला गया)

नूर तुम तो मान जाओ (शाहीन)

नही शाहीन ये सही नही है, इसके बदले अगर तुम मेरी जान भी माँगती तो हँस के देती, लेकिन ये नही हो सकता शाहीन, कभी नही हो सकता। (नूर)

तुम मुझसे वादा की थी नूर की ज़िंदगी में कभी भी तुमसे मदद माँगने पर तुम मेरी मदद करने जरूर आओगी। तुम आ तो गयी नूर पर मेरी मदद नही कर रही। क्या तुम सिर्फ आधा वादा निभाओगी। (शाहीन)

शाहीन ख़ुदा के वास्ते कुछ और माँग लो मुझसे (नूर)

नही नूर मुझे बस यही चाहिए, मैं चाहती हूँ जो खुशी अफज़ल को मेरे जीते जी ना मिल सकी वो खुशी मेरे मरने के बाद उसे हासिल होती रहे। अफज़ल बहुत अच्छे इंसान है नूर उन्हें अपना लो नूर उन्हें अपना लो। (खासते हुए शाहीन ने नूर से कहा)

नही शाहीन ये नही हो सकता (ये कह कर नूर भी कमरे से बाहर चली गयी।)

ये सारी बात शाहिल और शाहिस्ता बगल वाले कमरे से खिड़की के पास से सुन रहे थे। उन दोनो को समझ में ही नही आया कि आखिर हो क्या रहा है। वो दोनो नूर और अफज़ल के चले जाने के बाद अपनी अम्मी के कमरे में दाखिल हुए।

अम्मी ये आप अब्बू और वो नूर खाला किस बारे में बात कर रही थी। कौन है ये औरत अम्मी और क्या रिस्ता है इसका हमसे हमारे अब्बू से और आपसे। अम्मी दुनिया की कोई औरत जीते जी अपने शौहर को किसी और के साथ बाँट ही नही सकती। और आप यहाँ खुद अब्बू से खाला से ये कह रही है कि वो दोनो निक़ाह कर ले। (शाहिल और शाहिस्ता ने कहा)

मैंने तुमसे कहा था मेरे बेटे नूर वो औरत है जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी का सरमाया मेरी झोली में डाल दी। वो सरमाया कुछ और नही बल्कि तुम्हारे अब्बा और उन दोनों की मोहब्बत है। हाँ मेरे बच्चों (शाहीन ने उन्हें पूरी कहानी बताई)

शाहिल और शाहिस्ता को जब पता चला कि नूर एक तवायफ़ की बेटी है। तो शुरू में उन दोनों को उससे घृणा हुई। लेकिन जब उन्हें नूर की पूरी दास्तान पता चली तो उनके भी आँखों में आँसू आ गए। अब उनके दिल मे नूर के लिए घृणा नही बल्कि इज्जत थी।

लेकिन इसके बावजूद भी वो दोनो नूर को अपनी दूसरी माँ के तौर पे अपनाने को राज़ी नही हुए। शाहीन अब अपने इस फैसले के साथ अकेली पड़ गयी थी। शाहिस्ता और शाहीन दोनो अपने अपने कमरे में चले गए।

शाहिस्ता के शौहर गफ़्फ़ुर रहमान को जब इस बात की खबर हुई तो उसने अपनी बीवी शाहिस्ता को समझाया।

जो माँ बाप अपनी पूरी ज़िंदगी अपने बच्चों का मुस्तक़बिल बनाने में खुद को खपा देते है। अगर वो अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी भी अपने बच्चों से कुछ माँगे तो बच्चों का यह फर्ज़ बनता है कि वो उनकी ख़्वाहिश पूरी करे। लेकिन अफसोस वही बच्चे अपने माँ बाप की हर ख़्वाहिश को अपनी एक “ना” के पैरों तले रौंद देते है।

गफ़्फ़ुर के समझाने पर शाहिस्ता मान गयी। असल में वो सबसे ज्यादा अपने शौहर की नाराज़गी को लेकर चिंतित थी। कि जब उनके शौहर और उसके घर वालो को नूर बानो के बारे में पता चलेगा तो क्या सोचेंगे। लेकिन जब गफ़्फ़ुर ने अपनी बात कही तो शाहिस्ता को खुशी हुई। कि चाहे कोई साथ दे ना दे लेकिन उसका शौहर उसका साथ दे रहा है तो अब उसे किसी और कि परवाह नही, की कौन क्या कहता है।

शाहिस्ता ने अपने भाई से बात की उसकी भाभी जोकि उससे छोटी थी मानने को तैयार नही थी। लेकिन शाहिस्ता और गफ़्फ़ुर के समझाने पर शाहिल की बीवी नौरीन भी नूर और अफज़ल की निक़ाह को रज़ामंदी दे दी।

इधर नूर अपने कमरे में अकेली थी और उधर अफज़ल दूसरे रूम में था। दोनो इतने सालों बाद मिले इसके बावजूद एक दूसरे से नज़र मिलाना तो दूर एक दूसरे को देखना भी नही चाहते थे। शायद कुछ बच्चों बहु दामाद की शर्म तो कुछ खुद के मन मे पल रहे वहम, शायद ये सभी ही इसकी वजह थे।

सभी के बहुत कहने के बावजूद नूर और अफज़ल निक़ाह के लिए तैयार ही नही हुए। इसी तरह मानने और मनाने में हफ़्ते गुजर गए। नूर अब वापस अपने शहर लखनऊ लौटना चाहती थी। लेकिन उसका वादा अभी अधूरा था क्योंकि शाहीन ने जो उससे माँगी। वो उसे दे नही पाई इसीलिए वो शाहीन के पास वापस गयी।

शाहीन कल मैं यहाँ से चली जाऊँगी मुझे मेरे वादे से आज़ाद करो या फिर मुझे माफ़ कर दो अपने वादे को पूरा न कर पाने की वजह से मैं शर्मिंदा हूँ। (नूर)

क्योकि जो तुम माँग रही हो वो मैं तुम्हे दे नही सकती और न ही अफज़ल। इसीलिए बेहतर यही है कि तुम मुझे अब आज़ाद करो मेरे वादे से। (नूर)

नूर अभी बात कर ही रही थी कि शाहीन की हालत बिगड़ने लगी। देखते ही देखते उस घर का माहौल पूरी तरह से तितर बितर हो गया। असल में शाहीन साँस नही ले पा रही थी इसलिए उसे जल्दबाजी में हॉस्पिटल ले जाया गया।

"एक वादा जिसे हम भूल बैठे थे, मेरे रकीब ने पास बुलाकर याद दिला दिया"

 "अब वो वादा पूरा हो तो कैसे हो, न तुम राज़ी न हम राज़ी और साँसे बची है बस कुछ"

कहानी आगे जारी है ……………….

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