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इस्लाम की बुनियाद क्या है?

इस्लाम की बुनियाद इसका पहला कलमा है जिस पर हर मुस्लिम मर्द और औरत का पूरा ईमान है. वह कलमा अरबी में कुछ इस तरह से है –

ला इलाहा इलल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाहि

इसे कलमा ए शहादत कहा जाता है इस कलमा में तीन मुख्या गवाही है. जिसे हर मुस्लिम पढता है दुहराता है और इस पर अपना ईमान यानि की पूरा यकीं करता है.

यहाँ तक की अगर किसी गैर मुस्लिम को भी कभी मुस्लमान होना होता है. तो उसे इसी कलमा को पढना पड़ता है और इस पर पूरा ईमान रखना पड़ता है. सिर्फ और सिर्फ तभी जाकर वह मुस्लमान हो सकता है वरना नहीं.

आइये जानते है की इस कलमा का मतलब यानि की इसका अर्थ क्या है. यह कलमा तीन मुख्या ईमान से मिलकर बना हुआ है.

जब ये एक साथ आते है तो यह एक ईमान हो जाता है ठीक इस्लाम और मुसलमानों की तरह, जिनके बीच किसी भी तरह का कोई भेद भाव नहीं हो सकता है.

न ही गरीबी का, न जाती का, न रंग का, न रूप का, न ही क्षेत्र का, न ही देश या मुल्क का पूरी दुनिया के मुसलमान एक है.

क्योकि उन सभी  का ईमान एक है और अगर फिर भी कोई मुस्लमान किसी दुसरे मुस्लमान को अलग समझता है.

तो यह उसकी कम अकली का सबूत है और वह ऐसा करके खुद को गुनाह में डाल रहा है.

आइये हम अपने विषय पर आते है, यह कलमा अरबी में है जिसका हिंदी रूपांतरण हम यहाँ देखेंगे.

ला इलाहा यह कलमा ए शहादत का पहला हिस्सा है. जिसका अर्थ होता है कोई खुदा, भगवन, गॉड या इश्वर नहीं है

कलमा के पहले हिस्से में ही यह एलान करना की कोई खुदा या भगवान नहीं यह जान कर आपको थोडा आश्चर्य हो सकता है. लेकिन मुसलमानों के लिए नहीं, अगर आप मानव सभ्यता का पूरा इतिहास पढेंगे.

तो आपको पता चलेगा की दुनिया भर में अब तक जितनी भी सभ्यताए हुई उन सभी ने एक से ज्यादा खुदाओं को पूजा है.

यहाँ तक की हद तो तब हो गयी जब खुद इंसान ने खुद को खुदा कहा और लोगो  को खुद की इबादत (पूजा) करने को कहा.

जैसा की मिस्त्र के फिरौन करवाया करते थे. वह खुद को खुदा कहते है और अपनी प्रजा से कहते की वह उनकी पूजा करें.

ठीक इसी तरह से बहुत से राजा, महाराजा दुनिया भर में हुए जिन्होंने खुद को खुदा कहा और लोगो से कहा की वह उसकी पूजा करें.

उन्होंने अपनी बड़ी बड़ी मुर्तिया बनवाई जिनके सामने लोग झुकते और खाने पिने की चीजे रखा करते थे.

यहाँ तक की लोग उनकी पूजा भी करते थे, इसके बावजूद की दुनिया की हर सभ्यता में पैगम्बर (नबी, रसूल या मैसेंजर) भेजे गए है और उन सभी ने सिर्फ एक पैगाम सबको दिया.

की अल्लाह एक है और उसका कोई शरीक (साथी) नहीं है सिर्फ वही इबादत (पूजा) करने के लायक है और कोई नहीं है.

यह कहना इस बात का एलान करना है की दुनिया भर में जितने भी लोग है और वह जितने भी तरह के खुदाओं (एक से ज्यादा) की पूजा करते है.

वह खुदा नहीं है और न ही वह इबादत (पूजा) के लायक है. फिर चाहे वह लोग आग की पूजा करते हो, सुरज की पूजा करते हो, चाँद की पूजा करते हो, नदी की पूजा करते हो, पेड़ों की पूजा करते हो, बकरी की पूजा करते हो, साँप की पूजा करते हो, जितने भी तरह के जानवर और पक्षी है उनमे से किसी की पूजा करते हो, किसी चीज की मूर्ति की पूजा करते हो, आसमान या जमीन की पूजा करते हो, सितारों की पूजा करते हो, ग्रह या नक्षत्रों की पूजा करते हो, किसी चित्र, कला, इस दुनिया इस ब्रह्माण्ड में जितनी भी चीजें मौजूद है.

अगर कोई इंसान इस पुरे ब्रह्माण्ड में मौजूद किसी भी चीज (कुदरती या इंसानों की बनाई हुई) की इबादत (पूजा) करता है. वह सब झूटे खुदा है क्योकि इन सभी का विनाश होना तय है और जो खुदा होगा भला उसका विनाश कैसे हो सकता है.

जिसने इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की हो क्या भला उसे भी कभी मौत आ सकती है क्या? आप इसके बारे खुद ही सोचे?

इसलिए कलमा ए शहादत में सबसे पहले तमाम (सभी) झूटे खुदाओं को नाकारा गया. की कोई खुदा नहीं है इसलिए हम मुस्लमान नास्तिकों को मुबारकबाद देते है की उनमे इतनी अक्ल तो है. की वह झूटे खुदाओं की इबादत (पूजा) नहीं करते है.

अब आते है कलमा ए शहादत के दुसरे हिस्से पर इल लल्लाह जिसका अर्थ होता है. सिवाए अल्लाह के अब अगर आप मुस्लिम है तो शायद आपको यह अच्छी तरह से मालूम होगा.

की इस्माल में खुदा यानि की अल्लाह का जो तसव्वुर जो उसकी परिभाषा है वह क्या है. लेकिन हमारे गैर मुस्लिम भाइयों और बहनों को चूँकि इसके बारे में थोड़ी बहुत भी शायद ही जानकारी हो.

इसलिए हम उनकी जानकारी के लिए अल्लाह यानि खुदा की परिभाषा जोकि इस्लाम में है. उसके बारे में उन्हें बताना चाहेंगे की आखिर इस्लाम और उसे मानने वाले मुस्लमान किस तरह के खुदा की इबादत (पूजा) करते है.

इस ब्रहमांड में जो कुछ भी वह सब कुछ अल्लाह का है और इस ब्रह्माण्ड के कण कण की रचना अल्लाह ने की है. ज़मीनों आसमान में जो कुछ भी है वह सब कुछ अल्लाह का है. उसका कोई माँ बाप नहीं और न ही कोई रिश्तेदार है वह सिर्फ एक है. वह हमेशा था और हमेशा रहेगा इस ब्रहमांड और समय की शुरुआत से पहले भी सिर्फ वही था. वही है जिसने जन्नत (स्वर्ग) और दोजख (नर्क) बनाये और उसी के इजाजत से इन दोनों में से किसी एक में लोगो को उनके कर्मो के आधार पर दाखिल किया जायेगा. उसे किसी ने नहीं देखा (सिर्फ हजरत मोहम्मद स.ह.व. के) और न ही कोई उसे क़यामत से पहले देख सकता है. उसे नींद की जरुरत नहीं, उसे भूख नहीं लगती, उसे खाने की जरुरत नहीं, उसे पीने की जरुरत नहीं, उसे बैठने की जरुरत नहीं, उसे खड़े रहने की भी जरुरत नहीं, उसकी हुकूमत हर एक चीज पर है जो तुम्हे आँखों से दीखता है और जो तुम्हे तुम्हारी आँखों से नहीं दीखता, वो सबका बादशाह है, वही सच्चा न्याय करने वाला है, वह जिसे चाहे उसे माफ़ करने की ताक़त रखता है और उसे कोई पूछने वाला या उसे रोकने वाला नहीं, उसे किसी की जरुरत नहीं, वह जो चाहता है बस हो जाता है, उसे इस ज़मीन पर या किसी और ज़मीन पर खुद आने की जरुरत नहीं वह जब चाहे अपनी मदद भेज देता है और जब चाहे अपनी रहमत से दूर कर देता है, उसके फैसले पर या उसके काम पर किसी को भी सवाल करने का हक नहीं, सभी तारीफ सिर्फ उसी के लिए है, सबसे ज्यादा खुबसूरत सिर्फ वही है, वह सब कुछ देख रहा है, वो सब कुछ जो तुम अँधेरे में करते हो, वो सब कुछ जो तुम उजाले में करते हो, वो सब कुछ जो तुम छुप कर करते हो, वो सब कुछ जो तुम खुलेआम करते हो, वो सब कुछ सुनता है यहाँ तक की वो ख्याल भी जो हमारे दिल या दिमाग में है जिसे तुमने अभी तक जाहिर भी नहीं किया है, वह सब कुछ जानता है, जो तुम कुछ करते हो वो भी जानता है, और जो कुछ तुम करने वाले हो वह सब कुछ भी वह जानता है, वो जानता है की हम में से कौन जन्नत में जाने वाला है, वह जानता है की हम में से कौन जहन्नम में जाने वाला है, वह जानता है की हम में से कौन ईमान वाला है और कौन नहीं है, उसी ने मौत को बनाया और उसी ने ज़िन्दगी को बनाया है, उसी के हुक्म से हवाए बहती है, उसी के हुक्म से आग जलाती है, उसी के हुक्म से मिटटी टूटती फूटती और बनती है, वह चाहे तो आसमानों पर परिंदों की जगह हाँथी और घोड़ो को उडाये, अगर वह चाहे तो परिंदों को पानी में तैराए, उसकी ताक़त का अंदाज़ा कोई नहीं लगा सकता है, सबसे ज्यादा ताक़तवर वही है, वही है जिसने फरिस्तों को बनाया, वही है जिसने हूरों (जन्नत की लडकियाँ) को बनाया, वही है जिसने आदम को बनाया, वही जिसने माँ हव्वा को बनाया, वही है जिसने शैतान को बनाया, वही है जिसने जिन्नों को बनाया, वही है जिसने इस ब्रह्माण्ड में मौजूद इंसान की सोच से बाहर की ताक़तवर चीजों को अपने हुक्म से थाम रखा है, वह चाहे तो एक झटके में सब कुछ मिटा दे और उससे कोई सवाल करने वाला नहीं, वह किसी की आँखों में समा नहीं सकता, वह किसी के कलम से बयाँ हो नहीं सकता, वह ज़मीन पर चलने वाली चिटिओं तक की आवाज़ सुनता है, वही है जो सबको उसका रिज्क (पालन पोषण) देता है, वही है जो मौत को हुक्म देता है, वही है जो ज़िन्दगी को हुक्म देता है, उसे किसी रूप रंग में ढाला नहीं जा सकता, वही है जिसकी जितनी तारीफ की जाए फिर भी कम है, वही है जो सबका मालिक है, वही है जो सबका खालिक (बनाने वाला) है, वही है जो हमारे ज़बान से निकली हर एक बात का हिसाब रखता है, वही है जो हमारी हर एक नज़र का हिसाब रखता है, वही है जो हमारे खाए हुए हर एक अनाज के दाने का हिसाब रखता है, वही है जो हमारी पिने का हिसाब रखता है, वही है जो हमारे अच्छे और बुरे कामों का हिसाब रखता है, उसे अपनी खिदमत कराने के लिए किसी की जरुरत नहीं वो जब चाहे अपना खिदमतगार खुद ही बना कर उसे मिटा सकता है, वही है जिसके पास बेहिसाब दौलत है, वही है जो सबको देता है, वही है जो तुम्हे देता है, वही है जो हमे देता है, इसलिए कुरान में कहा गया है की सिर्फ एक ही खुदा की इबादत (पूजा) करो क्योकि उसका कोई सरिक (साथी) नहीं और जब कोई उसका सरिक ही नहीं तो भला उसके मुकाबले में कोई खड़ा कहाँ से हो सकता है. बेशक जो लोग उसके साथ किसी और को सरिक करते है उन्हें, उसकी माफ़ी नहीं मिलेगी फिर चाहे वो कितने ही सर पटक ले. बेशक अगर वो ईमान ले आये और एक ही खुदा और उसके पैगम्बर की बातों को माने और सिर्फ और सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करें तो वह उनके पिछले सभी गुनाह माफ़ कर देता है.

लेकिन उन सभी सभ्यताओं में जितने भी पैगम्बर (मैसेंजर) आये वह सभी सिर्फ और सिर्फ उस सभ्यता और उसी वक़्त तक के लिए आये.

उन्होंने जो भी सन्देश मानव जाति को दिए वह सिर्फ उसी वक़्त तक के लिए था. जब भी कोई पैगम्बर का वक़्त ख़त्म होता और उनका वापस जाने का वक़्त तय हो जाता.

तो वह पैगम्बर उनके बाद आने वाले पैगम्बर के बारे में बता कर जाते की उनके बाद एक और पैगम्बर अल्लाह (अरबी भाषा में इश्वर को अल्लाह के नाम से पुकारा जाता है, वैसे अल्लाह के 99 नाम है जिसे कुरान शरीफ में बताया गया है) की तरफ से आएगा.

तुम सभी को मेरे बाद उस पैगम्बर को फॉलो करना और सिर्फ और सिर्फ उसी की कही बातों को मानना है. जो उसकी बातों को मानेगा वह अपने ईमान पर मजबूती के साथ टिका रहेगा बाकी सब गुमराह (भटक) हो जायेंगे.

इस तरह से यह सिलसिला हजारों हजारों सालों तक चलता रहा, यहाँ तक की इस दुनिया में पहला इंसान और पहले पैगम्बर (हजरत आदम अलैहि सलाम और माँ हव्वा अलैहि सलाम क्रिस्चियन जिसे एडम और ईव के नाम से जानते है) से लेकर हजरत मोहम्मद रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो ता आला अलेही वसल्लम जोकि अल्लाह के तरफ से भेजे गए.

आखिरी नबी और सभी एक लाख चौबीस हजार (कम या ज्यादा) पैगम्बर के इमाम (पैगम्बर/मैसेंजर) है. तक एक लाख चौबीस हजार (कम या ज्यादा) पैगम्बर हमारी दुनिया में अल्लाह के तरफ से भेजे गए.

इस तरह से हजरत आदम अ.स. से लेकर आखरी पैगम्बर हजरत मोहम्मद रहमतुल आलमीन के आने और उनके वापस जाने के साथ ही इस्लाम हमारी दुनिया में मुकम्मल हो गया.

जबकि ज्यादातर गैर मुस्लिम यह मानते और सोचते है की इस्लाम हजरत मोहम्मद स.अ.व. से शुरू हुआ और उनके जाने के वक़्त मुकम्मल हो गया.

मगर ऐसा हरगिज नहीं है, क्योकि अगर ऐसा होता है तो हजरत मोहम्मद रहमतुल आलमीन. अपने आखरी खुतबे (बयान, स्पीच) में कुरान की आखरी आयत यूँ नहीं उतरती "आज मैंने तुम्हारे लिए दीन (सत्य धर्म) को पूरा कर दिया और तुम पर अपनी नेमत (कृपा) पूरी कर दी". Quran 5:3

 

नोट: इस आर्टिकल में दी गयी सभी जानकारी मेरी अपनी खुद की समझ के मातेहत है. अगर इस आर्टिकल को लिखने में कही पर भी मुझसे गलती हुई हो तो अल्लाह इसके लिए मुझे माफ़ करें. क्योकि इस्लाम एक तलवार की धार से ज्यादा तेज और बाल से भी ज्यादा बारीक़ है.

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